विश्व मजदूर दिवस: कोरोना से नहीं इन्हें भूख से डर लगता है…
अर्शी खान, रुद्रपुर। एक ओर जहां कोरोना माहमारी से लोग बचने के लिए घरो में रहने को मजबूर हैं। वहीं एक तबका ऐसा भी है जो घर में रहकर भी नहीं बच सकता, क्योंकि यह तबका अपनी रोजाना की कमाई पर ही जिंदा है। रोज काम करने पर ही इनके घर का चूल्हा जलता है। …
अर्शी खान, रुद्रपुर। एक ओर जहां कोरोना माहमारी से लोग बचने के लिए घरो में रहने को मजबूर हैं। वहीं एक तबका ऐसा भी है जो घर में रहकर भी नहीं बच सकता, क्योंकि यह तबका अपनी रोजाना की कमाई पर ही जिंदा है। रोज काम करने पर ही इनके घर का चूल्हा जलता है। सरकार की तमाम गाइड लाइनों के बावजूद मजबूरी में जीने के लिए इन्हें घर से बाहर निकलना पड़ रहा है, लेकिन वहां भी काम न मिलने पर मायूस होकर वापस आना पड़ रहा है। जी हां यह हाल है रुद्रपुर के श्रमिक अड्डे पर पहुंच रहे श्रमिकों का। यहां लॉकडाउन में भी कुछ मजदूर इस आस में काम के लिए आने को मजबूर हो रहे हैं कि शायद कुछ काम मिल जाए और शाम के खाने का इंतजाम हो जाए। वहीं इनमे से कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें तीन दिन से काम नहीं मिला है, वे मायूस होकर पुलिस की फटकार के बाद खाली हाथ वापस लौट जाते हैं। कुछ तो बाहर राज्य से यहां आकर किराये के मकान में मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं।
तीन दिन से काम नहीं मिला है। रोज काम की तलाश में यहां आ रहा हूं, लेकिन कोई काम देने वाला नहीं मिल रहा है। लॉकडाउन का पता तो है लेकिन दिहाड़ी मजदूर रोज कमाएगा नहीं तो घर पर खायेगा क्या।
-विरेश, मूल निवासी पीलीभीत
100 रुपये का काम भी नहीं मिल पा रहा है। जिससे कुछ खाने का इंतजाम किया जा सके। वहीं पैसे नहीं होने की वजह से घर में आर्थिक संकट भी बना हुआ है।
–धर्मेन्द्र, मूल निवासी बरेली
लॉकडाउन के बारे में पता तो है, लेकिन भूखे बच्चों और पेट को कौन समझाए, कौन बताए कि लॉकडाउन लगा हुआ है। -वेदपाल
लॉकडाउन की वजह से न तो काम है और न ही राशन लेने के पैसे। कोई उधार भी कब तक देगा। ऐसे में बहुत परेशान हैं। -मनोज
यहां किराये पर रहकर मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं, लेकिन काम न होने के कारण किराये तक के पैसे नहीं हैं।-ऋषिपाल
