गलत दवाओं की वजह से बढ़ता जा रहा रेलवे का मर्ज
संजय सिंह, नई दिल्ली। अपनी माली हालत सुधारने की हड़बड़ी में रेलवे जिस तरह के कदम उठा रही है उनसे उसका संकट कम होने के बजाय और गहराता जा रहा है। उस पर ये कहावत बिल्कुल चरितार्थ हो रही है कि “मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की।” हाल ही में रेलवे ने एक आदेश …
संजय सिंह, नई दिल्ली। अपनी माली हालत सुधारने की हड़बड़ी में रेलवे जिस तरह के कदम उठा रही है उनसे उसका संकट कम होने के बजाय और गहराता जा रहा है। उस पर ये कहावत बिल्कुल चरितार्थ हो रही है कि “मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की।”
हाल ही में रेलवे ने एक आदेश निकाला है जिसमें विभिन्न जोनों में लगभग 11 हजार से ज्यादा पद सरेंडर करने का प्रस्ताव किया गया है।
सबसे बड़ी रेलवे यूनियन एआइआरएफ महासचिव शिवगोपाल मिश्रा ने इसका जबरदस्त विरोध किया है। उन्होंने रेलवे बोर्ड चेयरमैन सुनीत शर्मा को आगाह किया है कि ऐसे वक्त जब लाखों रेलकर्मी जान हथेली पर रखकर ड्यूटी को अंजाम दे रहे हैं, दो हजार कर्मचारियों ने कोरोना से अपने प्राण गंवा दिए हैं, रेलकर्मियों को युद्धस्तर पर टीका लगाने के बजाय उनका मनोबल तोड़ने वाला ये कदम कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इसी बीच पश्चिम रेलवे के भुसावल डिवीजन से एक बेहद चौंकाने वाली खबर आई है। जहां तेज रफ्तार पुष्पक एक्सप्रेस से उत्पन्न कंपन के कारण चंदनीपुर स्टेशन की इमारत का अगला हिस्सा ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर गिर गया। इससे पहले पिछले दिनों ताउते तूफान के दौरान गुजरात के नवनिर्मित केवडिया स्टेशन की अत्याधुनिक इमारत की छत के उड़ने की खबर आई थी। पिछले साल पश्चिम बंगाल के बर्धमान स्टेशन में भी ऐसा ही हादसा हुआ था जब स्टेशन इमारत का निर्माणधीन हिस्सा अचानक ढह गया था। इसमें दो लोग घायल हुए थे।
इसी तरह कोलकाता में रेलवे से जुड़ी संस्था ‘क्रिस’ के आठ मंजिला भवन में आग की घटना को भी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं। जिसमें लिफ्ट की खराबी के कारण फंसने से दमकल, पुलिस व रेल कर्मियों समय 9 लोगों की मौत हो गई थी। लगातार सामने आ रही इस तरह की घटनाएं और एकतरफा फैसले इस बात का संकेत हैं कि रेलवे में सब कुछ ठीक नहीं है। सवा दो साल पहले लिए गए काडर मर्जर और रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन के साथ रेलवे मैनेजमेंट सर्विस नाम से रेलवे में अधिकारियों के रिक्रूटमेंट की नई सेवा प्रारंभ करने के फैसलों ने रेलवे इसी अपूरणीय क्षति पहुंची है जिसकी भरपाई दसियों सालों में संभव नहीं होगी।
पिछले छह सालों से निगमीकरण के नाम पर रेल सेवाओं के निजीकरण के जैसे प्रयास किए जा रहे हैं, और स्टेशन विकास से लेकर ट्रेन संचालन तक हर छोटे-बड़े कार्य को प्राइवेट कंपनियों के हवाले करने का अभियान छेड़ दिया गया है, उससे आने वाले समय में रेल यात्रा आम आदमी के बूते की बात रह जाएगी, इसमें संदेह है।
कहने को ये सब रेलवे की दशा सुधारने और लोगों को बेहतर सेवाएं प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। लेकिन आंकड़े कुछ और ही बयान करते हैं। हकीकत ये है कि सरकार के कदमों से रेलवे का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है तथा वो और दुर्गति का शिकार हो गई है। इसका प्रमाण नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) और संसदीय समिति की वे रिपोर्टें हैं जिनके मुताबिक न केवल रेलवे की माली हालत पहले से ज्यादा खराब है। बल्कि सेवाओं में भी कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है।
कैग की 2019-20 की उस रिपोर्ट को कौन भूल सकता है जिसमें कहा गया था कि रेलवे के ऑपरेटिंग रेशियो को तिकड़मबाजी से घटाया गया है।यदि अगली तिमाही की आमदनी को अग्रिम तौर पर न जोड़ा गया होता तो ऑपरेटिंग रेशियो के 100 फीसद को पार कर गया था। यानी वर्ष के दौरान रेलवे की आमदनी खर्च से कम रही है और वास्तव में उसे घाटा हुआ है।
जहां तक बीते 2020-21 कि बात है तो इसकी बानगी संसदीय समिति की नवीनतम रिपोर्ट देती है। जिसके मुताबिक कोरोना लाकडाउन के दौरान खर्चों में कमी के बावजूद नगण्य ट्रेन संचालन की वजह से रेलवे को यातायात आमदनी में 51,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। लिहाजा सरकार ने रेलवे को 63 हजार करोड़ का ब्याज रहित कर्ज 2019-20 के लिए तथा 16,398 करोड़ का 5.8 फीसद ब्याज दर वाला कर्ज 2018-19 के लिए दिया है। इन दोनों कर्जों की वापसी 2024 तक की जानी है।
ये रिपोर्टे बताती हैं कि आखिर रेलवे लगातार विचित्र फैसले क्यों ले रही है। दरअसल, सरकार की तरह रेलवे को भी कोरोना की दूसरी लहर का आभास नहीं था। और उसे उम्मीद थी कि यात्री ट्रेन यातायात को पूरी तरह शुरू कर वो सरकार के कर्ज का कर्ज अदा कर लेगी। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका। लिहाजा, पदों की छंटनी कर वेतन और पेंशन खर्चों में कमी का उपाय खोजा गया है।
