हल्द्वानी: सिस्टम का हार्ट फेल, दिल के रोग का नहीं इलाज
नरेंद्र देव सिंह, हल्द्वानी। कोरोना संक्रमण के दौरान सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की रही। सरकारी अमले ने इस मामले में काम भी किया और कुछ मामलों में सफलता भी हाथ लगी, जिसका लाभ जनता को मिल रहा है। लेकिन अभी भी कुमाऊं की सबसे बड़ी समस्याओं में से …
नरेंद्र देव सिंह, हल्द्वानी। कोरोना संक्रमण के दौरान सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की रही। सरकारी अमले ने इस मामले में काम भी किया और कुछ मामलों में सफलता भी हाथ लगी, जिसका लाभ जनता को मिल रहा है। लेकिन अभी भी कुमाऊं की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक मामला यह है कि यहां के सरकारी अस्पतालों में कार्डियोलोजिस्ट नहीं होने से दिल का इलाज संभव नहीं है। कम आय वाले लोगों को उपचार के लिए प्राइवेट अस्पतालों में जाना पड़ता है जो काफी महंगा पड़ता है।
बद्रीपुरा स्टेडियम से सटा हुआ हृदय रोग संस्थान करीब दस सालों से धूल फांक रहा है। जिस सोच के साथ इस इमारत को खड़ा किया गया था यहां पर वह पूरी ही नहीं हुई। जब हृदय रोग संस्थान बनाया गया था तब कुमाऊंवासियों ने सोचा था कि अब हृदय से जुड़ी बीमारियों का उपचार उन्हें अपने ही मंडल के शहर में मिल जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यह इमारत वीरान पड़ी रही।
42 लाख की आबादी प्राइवेट पर निर्भर
कभी-कभी स्वास्थ्य विभाग यहां पर अन्य काम कर लेता है। जैसे कि पिछले दिनों यहां पर कोरोना मरीजों की जांच के लिए अलग वार्ड बनाया गया था और यहां पर कोविड मरीजों की जांच की जाती थी। इसके अलावा इस अस्पताल का कोई काम नहीं है। करोड़ों की यह इमारत स्वास्थ्य विभाग के किसी भी काम नहीं आ रही है, जिसका बड़ा कारण यह है कि सरकार के पास कोई भी कार्डियोलोजिस्ट नहीं है जिसे वह कुमाऊं मंडल में तैनात कर सके। मंडल की करीब 42 लाख की आबादी हृदय रोग से जुड़ी बीमारियों के उपचार के लिए निजी चिकित्सकों पर ही निर्भर है। या फिर ज्यादा गंभीर मामला हो जाने पर बरेली, दिल्ली जैसे महानगरों की ओर दौड़ लगानी पड़ती है। इस दौड़ में कई लोगों की समय पर इलाज नहीं मिलने की वजह से मौत भी हो जाती है।
कुमाऊं में करीब पांच लाख हृदय रोगी
हल्द्वानी। आंकड़ों की मानें तो कुमाऊं मंडल में करीब पांच लाख लोग हृदय रोगी हैं। मैदान में ही नहीं पहाड़ों पर भी हृदयरोगियों की काफी तादाद है। हृदयघात के समय सभी को निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है। जहां लोगों को आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाता है और आम आदमी को भी रोग मुक्त होने के लिए लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं।
फिजिशियन ही देखते हैं हृदयरोगियों को
हल्द्वानी। सरकारी अस्पतालों में कार्डियोलोजिस्ट न होने की वजह से फिजिशियन ही हृदय रोगियों को देखते हैं। हालांकि यह सेवा मेडिसन तक ही सीमित रहती है। सर्जरी के लिए अन्य अस्पतालों में जाना पड़ता है।
12 साल से नहीं मिला कोई कार्डियोलोजिस्ट
हल्द्वानी। सरकारी तंत्र ने मेडिकल कॉलेज में सरकारी खर्चे पर एक कार्डियोलोजिस्ट को तैयार किया था। इन्होंने यहां पर अस्पताल में अपनी सेवाएं भी शुरू की थीं। बाद में इस चिकित्सक ने व्यवस्था से नाराज होकर साल 2009 में अस्पताल को छोड़ दिया। तब से करीब 12 साल हो गए लेकिन यहां पर कोई भी कार्डियोलोजिस्ट नहीं आ पाया है।
कोविड काल में इन स्वास्थ्य सेवाओं में हुआ सुधार
हल्द्वानी। कोविड के दौरान जिन सरकारी स्वास्थ्य सेवाओ में सुधार हुआ है उसमें बेस अस्पताल में एचडीयू और आईसीयू स्थापित करना शामिल है। इस अस्पताल में एचडीयू और आईसीयू को स्थापित करने की मांग कई साालों से की जा रही थी। इसके अलावा महिला अस्पताल में भी एचडीयू को स्थापित किया जा चुका है। जिसके बाद गंभीर प्रसव के मामलों में गर्भवति महिलाओं की जान बचाने में अब आसानी हो रही है। इसके अलावा डीआरडीओ ने यहां पर 500 बेड का अतिरिक्त अस्पताल तैयार किया है। साथ ही पहाड़ में कई जगह कोविड वार्ड और ऑक्सीजन प्लांट बनाए गए हैं।
कुमाऊं के सरकारी अस्पतालों में कार्डियोलोजिस्ट नहीं है। यहां पर कार्डियोलोजिस्ट की व्यवस्था करने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।- डा. शैलजा भट्ट, स्वास्थ्य निदेशक कुमाऊं
