हल्द्वानी: हिंदू न मुसलमान बस इंसानियत अपनी कौम, पढ़िए पूरी खबर…

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अमृत विचार, हल्द्वानी। सबका एक कप, एक ही चम्मच से दूध, सबकी एक जैसी चीनी, एक जैसा खून तो फिर क्या हिंदू क्या मुसलमान, यह कहना है दया किशन पांडे का जिन्होंने एक दूसरे धर्म के बच्चे को उस वक्त अपनाया जब उसके सर से माता-पिता का साया उठ चुका था। उसे काम सिखाया, पैरों …

अमृत विचार, हल्द्वानी। सबका एक कप, एक ही चम्मच से दूध, सबकी एक जैसी चीनी, एक जैसा खून तो फिर क्या हिंदू क्या मुसलमान, यह कहना है दया किशन पांडे का जिन्होंने एक दूसरे धर्म के बच्चे को उस वक्त अपनाया जब उसके सर से माता-पिता का साया उठ चुका था। उसे काम सिखाया, पैरों पर खड़ा होने के काबिल बनाने के साथ जिम्मेदारियों को उठाना सिखाया।

आज जहां जाति धर्म के नाम पर लोगों बंटे हुए हैं वहीं “मकसूद” के जीवन की कहानी कुछ और है। मकसूद के पिता का इंतकाल एक बीमारी के चलते सन् 1974 में हो गया जिसके बाद परिवार की हालत बिगड़ने लगी पांच भाई होने के बावजूद परिवार के सामने चुनौतियां कम नहीं थी। इस वक्त केमू बस अड्डे के पास राम मंदिर के पास दुकान चलाने वाले दया किशन पांडे ने मकसूद और उसके परिवार को हरसंभव मदद की और मकसूद के बाल्य जीवन से ही उसे शिक्षा दिलाने के साथ लॉकर,अलमारी और कूलर बनाने का काम सिखाया।

बाद में उसका विवाह भी मुस्लिम धर्म के अनुसार करवाया। आज मकसूद 52 वर्ष के हैं और उनकी दो लड़कियां और एक पुत्र है सभी नाबालिग हैं और शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। मगर मकसूद और उसके परिवार का रिश्ता दया किशन के परिवार से किसी बाप-बेटे के रिश्ते से कम नहीं है। इन दो परिवारों की कहानी बॉलीवुड की फिल्म बजरंगी भाईजान से कम नहीं है और रिश्ता इतना अटूट है कि आज भी इतने वर्ष बीत जाने के बाद दोनों परिवारों के बीच एक इंच का भी फासला नहीं। इन दो परिवारों का रिश्ता तमाचा है उन लोगों के गाल पर जो हिंदू-मुसलमान में उलझ देश की सांप्रदायिकता और अखंडता को तोड़ने मरोड़ने का काम करते हैं।

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