उत्तराखंड में कभी तीसरी ताकत हुआ करती थी बसपा, आज शून्य की ओर
नरेंद्र देव सिंह, हल्द्वानी। उत्तराखंड गठन के बाद पूर्व में यूपी की पार्टियों ने यहां दमखम दिखाया और उसमें बसपा का भी नाम आता है। राज्य के शुरुआती चुनाव में बसपा ने अपने प्रदर्शन से सभी चौंकाया था। एक समय यह पार्टी में राज्य में कांग्रेस के लिए खतरा तक बन गई थी। यही नहीं …
नरेंद्र देव सिंह, हल्द्वानी। उत्तराखंड गठन के बाद पूर्व में यूपी की पार्टियों ने यहां दमखम दिखाया और उसमें बसपा का भी नाम आता है। राज्य के शुरुआती चुनाव में बसपा ने अपने प्रदर्शन से सभी चौंकाया था। एक समय यह पार्टी में राज्य में कांग्रेस के लिए खतरा तक बन गई थी। यही नहीं एक बार सहयोगी दल के रूप में सरकार में भी बसपा शामिल हो चुकी है, लेकिन आज उत्तराखंड में बसपा के खाते में शून्य है और यह पार्टी शून्य की ओर ही बढ़ती जा रही है।
राज्य के पहले चुनाव के जब नतीजे सामने आए तो उत्तराखंड में सात सीटें जीत बसपा ने सबको हैरत में डाल दिया। हालांकि यह सीटें यूएसनगर और हरिद्वार जैसे मैदानी जिलों से थी, लेकिन कांग्रेस और भाजपा के नेता समझ चुके थे कि उत्तराखंड में बसपा को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। इसके बाद 2007 में बसपा ने फिर से चौंकाने वाला प्रदर्शन करते हुए आठ सीटें झटक लीं।
इनमें से छह सीटें हरिद्वार जिले से जीती थी। हालांकि हाथी पहाड़ नहीं चढ़ पा रहा था, लेकिन पार्टी ने पहाड़ में भी पैठ बढ़ाने के लिए काम करना शुरू कर दिया। 2012 में बसपा का मतप्रतिशत तो बढ़ा, लेकिन झोली में सीटें केवल तीन ही आई। बाद में पार्टी कांग्रेस को समर्थन देकर सरकार में शामिल हो गई। शायद पार्टी के लिए यही नहीं गिरने का दौर शुरू हुआ। बसपा अपने गढ़ हरिद्वार में अपने नेता खोते गई। कांग्रेस एक-एक करके बसपा के नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करती गई। कांग्रेस को पता था कि बसपा उसके लिए मैदानी इलाकों में बढ़ा खतरा है। बसपा ने दलित और मुस्लिम के समीकरण को काफी अच्छे से साधा था और यह दोनों ही कांग्रेस के कोर वोटर हैं। बाद में 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा अपना खाता भी नहीं खोल पाई और सके मतप्रतिशत में भी पांच प्रतिशत तक की गिरावट आ गई। फिलहाल पार्टी अपना जनाधार वापस पा पाती है या नहीं यह बाद में ही पता चलेगा।
जब बसपा को रोकने के लिए यशपाल को आगे बढ़ाया था
हल्द्वानी। शुरूआती दो विधानसभा चुनाव में बसपा लगातार अपनी बढ़त बना रही थी। मैदान में अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद बसपा पहाड़ की तैयारी करने लगी। यह कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी की थी। क्योंकि अगर बसपा आगे बढ़ती तो कांग्रेस को बहुत बड़ा नुकसान होता। इससे निपटने के लिए कांग्रेस ने यशपाल आर्या को आगे बढ़ाया और उनको पार्टी का अध्यक्ष बना दिया। बाद के दिनों में कांग्रेस को इसका फायदा भी मिला था।
बसपा का चुनावी प्रदर्शन
साल सीटें मत प्रतिशत
2002 7 10.93
2007 8 11.76
2012 3 12.19
2014 0 7. 0
