मुरादाबाद : जब ‘सुकून-ए-दिल के लिए…’ सुना कर लूट ली थी महफिल
मुरादाबाद। मशहूर शायर मंसूर उस्मानी महानगर के इकलौते खुशनसीब आदमी हैं, जिन्होंने रुपहले पर्दे से लेकर मुशायरों की दुनिया की बादशाहत करने वाले चरित्र अभिनेता मोहम्मद यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार के साथ मंच साझा किया है। केके बिड़ला फाउंडेशन की ओर से साल 1991 में बंबई (मुंबई) के रंग भवन में मुशायरा आयोजित था। …
मुरादाबाद। मशहूर शायर मंसूर उस्मानी महानगर के इकलौते खुशनसीब आदमी हैं, जिन्होंने रुपहले पर्दे से लेकर मुशायरों की दुनिया की बादशाहत करने वाले चरित्र अभिनेता मोहम्मद यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार के साथ मंच साझा किया है। केके बिड़ला फाउंडेशन की ओर से साल 1991 में बंबई (मुंबई) के रंग भवन में मुशायरा आयोजित था। तत्कालीन उपराष्ट्रपति हिदायतुल्ला उस मुशायरे की पहली कतार में श्रोता के रूप में बैठे थे। दिलीप कुमार ने सुकूने दिल के लिए… सुनाकर महफिल लूट ली थी।
ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार के निधन की खबर से शायर उस्मानी गमगीन हैं। कहते हैं कि वह कुछ दिन से बीमार थे। इस दौरान उनके गुजर जाने की कई झूठी खबरें भी आईं। मगर इस बार झूठ दगा दे गया। समय ने आखिरकार उन्हें हमसे छीन ही लिया। उनके निधन से सिनेमा का विश्वविद्यालय खाली हो गया। वह बड़े इंसान थे। सिनेमा के साथ उन्होंने सियासत और साहित्य से भी रूहानी रिश्ता कायम रखा। इसके साथ ही वह कांग्रेस के स्टार प्रचारक भी रहे। कहते हैं कि आज भी उन्हें वह मंच अच्छी तरह याद है, जब उन्होंने मुंबई में पढ़ा था-
सुकून-ए-दिल के लिए कुछ तो
एहतमाम करूं
जरा नजर तो मिले फिर उन्हें सलाम करूं
मुझे तो होता नहीं आप मशवरा दीजे
कहां से छेडूं फसाना कहां तमाम करूं
मुशायरे में उनकी इस शायरी के सभी कायल हो गए थे। तालियां इतनी बजीं जितनी शायद पूरे मुशायरे में किसी और के लिए नहीं बजीं। उस्मानी कहते हैं कि वह फैज और नजीर अकबराबादी के शेर सुनाते थे। फिराक गोरखपुरी से भी उनका रूहानी रिश्ता था। वह मुशायरों के मंचों पर एक दूसरे के करीब बैठते थे। हालांकि फिराक साहब तुनक मिजाज भी थे। इसीलिए मुंबई के मुशायरे में दिलीप साहब ने फिराक साहब को देर से सलाम किया तो वह (फिराक) बोल पड़े तुम कौन? तो दिलीप कुमार समझ गए कि उनकी शान में कुछ गुस्ताखी हुई है।
शायर उस्मानी के अनुसार 1944 में पहली फिल्म ज्वार भाटा से अभिनय की शुरुआत करने वाले दिलीप कुमार ने 1998 में खिलाफ फिल्म में आखिरी बार अभिनय किया था। वह पहले अभिनेता थे, जिन्होंने विज्ञापन के लिए काम नहीं किया। सिनेमा में नाचे नहीं। वह मूल रूप से राष्ट्रवादी थे। प्रतिष्ठा उन्हें पसंद थी। पाकिस्तान से आकर उनका परिवार हिंदुस्तान में बसा तो आजीवन हिंदुस्तानी ही रहा।
उस्मानी दिलीप कुमार की बेगम सायरा बानो की भी खुलकर तारीफ करते हैं। कहते हैं कि वह सचमुच भारतीय महिलाओं के लिए आदर्श हैं। वह रोल मॉडल हैं। कुमार साहब की बीमारी के दौरान सेवा का उन्होंने अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने जिंदगी के आखिरी पल तक कुमार साहब पर मोहब्बत लुटाई। वह मोहब्बत की वाकई नायाब नगीना हैं।
-आशुतोष मिश्र
