बरेली: कोरोना की भयावहता वाया आनलाइन प्रचार और सोशल मीडिया की वैकेंसियां
आनंद सिंह, बरेली। शनिवार को जब देश के मुख्य चुनाव आयुक्त पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तिथियां घोषित करते हुए यह कह रहे थे कि अब 15 जनवरी तक चुनाव प्रचार डिजिटल होगा तो एकबारगी लोगों को यकीन नहीं हुआ। किंचित यह पहला मौका है जब देश के पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव …
आनंद सिंह, बरेली। शनिवार को जब देश के मुख्य चुनाव आयुक्त पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तिथियां घोषित करते हुए यह कह रहे थे कि अब 15 जनवरी तक चुनाव प्रचार डिजिटल होगा तो एकबारगी लोगों को यकीन नहीं हुआ। किंचित यह पहला मौका है जब देश के पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं और इन चुनावों के लिए न तो रैलियां होंगी, न किसी किस्म का शारीरिक कैम्पेन और न ही कोई विजय जुलूस निकलेगा। आप किसी और को नहीं, कोरोना को ही इसका क्रेडिट देंगे। कोरोना ने लाखों जिंदगियां तो छीनी ही, पर इसके भयानक रूप ने चुनाव जैसे बेहद खर्चीली प्रक्रिया को भी बेहद आसान कर दिया है। लिहाजा, यहां कोरोना को मितव्ययिता के लिए शुक्रिया तो कहना बनता है।
चुनाव खर्च की सीमा बेशक 40 लाख रुपये कर दिये गए हों, तमाम बंदिशें लागू कर दी गई हों, हकीकत है कि देश का लोकतांत्रिक मन-मिजाज आज भी बाहर निकल कर, गप्प करने, किसी की आलोचना तो किसी की तारीफ करने के लिए उतावला हुआ जाता है। जैसे आनलाइन कक्षाएं भी कोरोना की ही देन हैं, वैसे ही चुनाव प्रचार भी आनलाइन ही होंगे।
उनके लिए यह शामत भरी खबर है, जिन्होंने कभी फेसबुक, ट्विटर आदि चलाया नहीं। वो प्रचार करें तो कैसे। उनके चेलों ने बताया कि फिक्र नहीं करने का। बहुत सारे सोशल मीडिया मैनेजर खाली हैं। उन्हें ही दो माह के लिए काम दे दिया जाए। मात्र 24 घंटों में इंडीड और लिंक्डइन जैसी नौकरी में सहायक वेब कंपनियों में विभिन्न सियासी दलों ने सोशल मीडिया एडवाइजर अथवा सोशल मीडिया मैनेजर की वैंकेसी दे डाली है। तनख्वाह भी 25 से 50000 रुपये प्रतिमाह तक। रहना-खाना फ्री।
चूंकि आयोग ने तय कर दिया है कि 15 जनवरी तक कोई रैली-नुक्कड़ सभा नहीं होनी है तो यह लाजिमी है कि जो भी लोग चुनाव लड़ना चाहते हैं, वो अपनी मजबूती सोशल मीडिया पर ही दिखाएं। यह बेशक मजबूरी का सौदा है पर जान-माल के लिए जरूरी भी तो है। समाजवादी पार्टी के एक भावी प्रत्याशी कहते हैंः हम लोग तो 10वीं पास हैं। कहां चला पाएंगे सोशल मीडिया। अब इलाके में जा नहीं सकते। मजबूरी में सोशल मीडिया पर ही प्रचार करना होगा। जो होगा, देखा जाएगा।
भाजपा के 20 साल से एक विधायक रहे कहते हैंः टिकट तो मेरी पक्की ही है। सोशल मीडिया पर मैं 10 साल से हूं। मेरा जीवन खुली किताब है। मैंने जो कुछ भी किया है, फेसबुक पर मौजूद है। ट्विटर पर आपको वीडिओज मिल जाएंगे। चूंकि मैं विधायक हूं तो 20 साल से लोगों से मिल ही रहा हूं। मुझे कोई फर्क पड़ेगा भी नहीं। अब बढ़िया है। मैं यूट्यूब पर अपने नाम से चैनल बनाने जा रहा हूं। फेसबुक लाइव भी कर दूंगा, चैनल पर भी उसे अपलोड कर दूंगा।
