50 साल में सबसे अधिक बार बदला रायबरेली का भूगोल, जानें कैसे…
रायबरेली। गांधी परिवार का घर माने जाने वाले रायबरेली जिले का 50 साल में सबसे अधिक बदलाव किया गया। यह वह जिला है जिसकी विधानसभाओं को बदला गया तो साथ ही लोकसभा क्षेत्र में भी परिवर्तन किया गया। रायबरेली पिछले पचास साल में सबसे अधिक पांच बार बदलाव का शिकार हुई है। फिरोज गांधी, इंदिरा …
रायबरेली। गांधी परिवार का घर माने जाने वाले रायबरेली जिले का 50 साल में सबसे अधिक बदलाव किया गया। यह वह जिला है जिसकी विधानसभाओं को बदला गया तो साथ ही लोकसभा क्षेत्र में भी परिवर्तन किया गया। रायबरेली पिछले पचास साल में सबसे अधिक पांच बार बदलाव का शिकार हुई है।
फिरोज गांधी, इंदिरा गांधी और अब सोनिया गांधी जिले की सांसद हैं, लेकिन हर बार जब परिसीमन हुआ तो रायबरेली के टुकड़े कर दिए गए। इसका सबसे अधिक खामियाजा कांग्रेस को ही भुगतना पड़ा है। सबसे पुरानी विधानसभा डलमऊ और सतांव का अस्तित्व खत्म हो चुका है और उनकी जगह हरचंदपुर तथा ऊंचाहार विधानसभा फलक पर आ गई हैं।
1957 में जिला दो संसदीय क्षेत्रों रायबरेली उत्तरी और रायबरेली आंशिक के नाम से जाना जाता था। उस दौरान दो सांसद जनपद का प्रतिनिधित्व करते थे। वर्ष 1962 में किए गए परिसीमन एक लोकसभा सीट बची जिसे रायबरेली का नाम दिया गया और फिरोज गांधी सांसद बने। उसके बाद रायबरेली और सुल्तानपुर जिले को तोड़कर अमेठी लोकसभा सीट बना दी गई।
इस तरह तिलोई, अमेठी, गौरीगंज और जगदीश पुर विधानसभा बनी। अमेठी जिला बनने से अमेठी, गौरीगंज विधानसभा रायबरेली से हमेशा के लिए हट गईं। असल में 1967 में सलोन विधानसभा क्षेत्र को तोड़कर प्रतापगढ़ व कुछ भाग अमेठी में जोड़ दिया गया था।
2012 में विधानसभा चुनाव से पहले सभी विधानसभाओं के क्षेत्रों को बदल दिया गया। देश की सबसे पुरानी विधानसभा डलमऊ को खत्म कर दिया गया वहीं सतांव को भी हरचंदपुर विधानसभा बना दिया गया। डलमऊ के आधे से अधिक हिस्से को काटकर ऊंचाहार विधानसभा सीट बना दी गई। सिर्फ सलोन विधानसभा सीट ही ऐसी बची जिसको परिसीमन में सबसे अलग रखा गया।
इतिहास बन गई डलमऊ विधानसभा
पतित पावनी गंगा के तट पर बसे डलमऊ का नाम इतिहास के कई पन्नों में दर्ज है, लेकिन वर्षों पुरानी विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाली डलमऊ नगरी के नाम को ही मिटा दिया गया। डलमऊ को सरेनी का एक अंग बनाकर इस सीट को ऊंचाहार विधानसभा का नाम दे दिया गया। ऐसे में अब डलमऊ केवल इतिहास का अंग बनकर रह गई है।
कांग्रेस का गढ़ हुआ कमजोर
पांच बार रायबरेली के भूगोल में परिवर्तन से कांग्रेस का गढ़ कमजोर हुआ। 1992 तक रायबरेली की सभी सात विधानसभाओं में कांग्रेस का ही कब्जा रहता था लेकिन राम लहर और मुलायम सिंह और बसपा संस्थापक कांशीराम की जोड़ी ने 1993 के विधानसभा चुनाव में सबसे पहले सेंध लगाई थी। डलमऊ से सपा गजाधर सिंह कांग्रेस के दिग्गज नेता हरिनरायण सिंह को हराकर विधायक बने और उसके बाद कांग्रेस धीरे-धीरे सिमटना शुरू हो गई।
नतीजा सामने है 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पहली बार अपने घर में बिना किसी विधायक के चुनाव मैदान में होगी। 2017 में सदर से विधायक बनी अदिति सिंह और हरचंदपुर से जीते विधायक राकेश सिंह कांग्रेस को छोड़ भाजपा के साथ हो गए हैं।
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