हल्द्वानी: जल्द कुमाऊंनी बोली में डिप्लोमा और डिग्री कोर्स कर सकेंगे विद्यार्थी

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हल्द्वानी, अमृत विचार। प्रदेश भर के शैक्षणिक संस्थानों की शिक्षा प्रणाली में अहम परिवर्तन होने वाला है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के बाद कॉलेजों में शिक्षा का परिवेश कुछ अलग तरह का दिखेगा। नई नीति के अंतर्गत उत्तराखंड राज्य में कुमाऊंनी बोली को भी पढ़ाई के साथ जोड़ा जाएगा। अब विश्वविद्यालयों में छात्रों …

हल्द्वानी, अमृत विचार। प्रदेश भर के शैक्षणिक संस्थानों की शिक्षा प्रणाली में अहम परिवर्तन होने वाला है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के बाद कॉलेजों में शिक्षा का परिवेश कुछ अलग तरह का दिखेगा। नई नीति के अंतर्गत उत्तराखंड राज्य में कुमाऊंनी बोली को भी पढ़ाई के साथ जोड़ा जाएगा। अब विश्वविद्यालयों में छात्रों को कुमाऊंनी बोली में सर्टिफिकेट, डिप्लोमा भी मिलेगा। इसके साथ ही डिग्री कोर्स करने का भी अवसर मिलेगा।

कुमाऊंनी बोली को मान्यता प्राचीन काल है, हालांकि आज के जमाने में युवा अपने बोली में बातचीत करने में कतराते हैं। अब इसे संरक्षित करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत काम किया जाएगा। इसे संरक्षित करने व एक शब्दकोश तैयार करने के लिए गांव-गांव में सर्वे कर शोध प्रोजेक्ट भी चलाया जाएगा। इसके साथ ही स्नातक प्रथम पाठ्यक्रम में ऐपण को भी शामिल किया गया है।

कुमाऊं विश्वविद्यालय नई शिक्षा नीति के अंतर्गत विभिन्न विभागों के तैयार पाठ्यक्रमों को अंतिम रूप देने की जुगत में जुटा हुआ है। इसी कड़ी में कुमाऊं विवि की ओर से राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया है। कला संकाय के विभागों के अंतर्गत हिंदी, अंग्रेजी, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र समेत कई विषयों के तैयार पाठ्यक्रमों को फाइनल टच दिया गया। एमबीपीजी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. बीआर पं‍त की मानें तो स्नातक प्रथम में कुमाऊंनी में दो साल का डिप्लोमा कोर्स, एक साल का सर्टिफिकेट कोर्स तथा तीन साल में डिग्री ऑफ आर्ट दी जाएगी।

गढ़वाली और कुमाऊंनी पाठ्यक्रम किए जा रहे तैयार
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार गढ़वाल मंडल में गढ़वाली, कुमाऊं मंडल में कुमाऊंनी बोली का अध्ययन करने के लिए पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि अगले सत्र से राज्य के छात्र छात्राओं को अपनी लोक बोली का अध्ययन करने का मौका मिलेगा। इसके साथ ही उन्हें लुप्त होती है ऐपण कला सीखने को भी मिलेगी। जिससे लोक बोली और लोक कला को काफी बढ़ावा मिलेगा

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