बाराबंकी: इतिहास के पन्ने में गौरवशाली अतीत को समेटे ‘जलाहली माता कुआं‘ आज लड़ रहा अपने अस्तित्व की लड़ाई

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बाराबंकी। यूक्रेन और रूस में जहां जंग छिड़ी है, वहीं विश्वयुद्ध की आहट पर सबकी निगाहें टिकी हुई है। दो देशों के बीच चल रहे युद्ध के बीच दरियाबाद के कुएं का इतिहास भी इन दिनों चर्चा में आ गया। यह कुआं हर मर्ज की दवा के साथ ही पाकिस्तान से हुए भारत के युद्ध …

बाराबंकी। यूक्रेन और रूस में जहां जंग छिड़ी है, वहीं विश्वयुद्ध की आहट पर सबकी निगाहें टिकी हुई है। दो देशों के बीच चल रहे युद्ध के बीच दरियाबाद के कुएं का इतिहास भी इन दिनों चर्चा में आ गया। यह कुआं हर मर्ज की दवा के साथ ही पाकिस्तान से हुए भारत के युद्ध में दरियाबाद के लिए अहम थी। दरियाबाद का यह कुंआ इतिहास के पन्ने में गौरवशाली अतीत को समेटे हुए है।

यह कुआं  1970 के दौर में जलाहली माता कुआं से मशहूर हुआ

दरियाबाद बारिनबाग रोड के किनारे स्थित एक कुआं ऐसा भी था, जिसने दरियाबाद को एक नई पहचान दी। और इस कुंए के माध्यम से दरियाबाद देश के कोने कोने में जाना जाने लगा था । यदि बीते पांच दशक पुरानी बात करें तो कुएं अपने पूरे अस्तित्व में थे जिनका उपयोग जल स्त्रोत के रूप में किया जाता था। आज हम आप को जिस कुएं के बारे में बता रहे है यह कुआं  1970 के दौर में जलाहली माता कुआं से मशहूर हुआ। यह जल स्रोत 5 दशक बाद देखरेख के अभाव में गुमनाम सा जरूर हो गया । लेकिन पड़ोसी देश की लड़ाई से लेकर उस दौर में दर्द मर्ज पर विजय पाने के लिये अहम थी ।

जलाहली नाम के इस कुएं को मौजूदा समय में एक पाकड़ के पेड़ ने अपने कब्जे में ले लिया है आज यह कुआं भले ही अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा हो लेकिन एक समय था जब इस कुंए के एक बूंद पानी को पाने के लिए लोग धक्का मुक्की करते थे। हजारो की भीड़ इस कुंए पर हर समय जमा रहती थी ।

दरियाबाद का नाम देश के हर कोने में विख्यात हो गया

बताया जाता है उस समय इस कुएं के पानी पीने स्नान आदि करने से बड़े बड़े रोग छू मंतर हो जाते थे । गंभीर रोगों का कुंए के पानी पीने नहाने से ठीक हो जाने की बात में कितनी सच्चाई थी या यह कोई कोरी अफवाह थी लेकिन यहां जो महीनों भीड़ जुटी उस भीड़ का मतलब केवल कुंए के पानी से था । यह बात जहां तक फैली तो देश के कोने कोने के लोग इस कुएं का पानी लेने दरियाबाद पहुंचे जिससे दरियाबाद का नाम देश के हर कोने में विख्यात हो गया था ।

जब भीड़ बढ़ी तो इस कुंए पर पूजा पाठ भी शुरु हो गया यहां पुजारी बने दरियाबाद निवासी 80 वर्षीय बुजुर्ग दुर्गादत्त बाजपेई बताते है । कि 19 69 – 70 के आस पास के समय मे यहां पर इतनी भीड़ जुटती थी कि कही कदम रखने की जगह नही होती थी। देश के कोने कोने से ही नही पाकिस्तान से भी लोग पानी लेने यहां पहुंचे थे । भीड़ इतनी बढ़ी की चढ़ावा भी चढ़ने लगा। जब आपस में मन मुटाव हुआ तो उस समय के मौजूदा कलेक्टर को यहां आकर इस कुएं के रखरखाव को लेकर कमेटी गठित करनी पड़ी । दुर्गादत्त बाजपेई बताते है उस समय दरियाबाद रेलवे स्टेशन से लेकर दरियाबाद कस्बे तक परिक्रमा की तरह लोग सड़क पर पैदल चलते थे।

दशहरा बाग में एक अस्थाई चौकी भी बनाई गयी थी

रेलवे विभाग की तरफ से दरियाबाद स्टेशन पर यात्रियों के लिये आठ जगह रेलवे टिकट का वितरण किया जाता था । पहली बार लखनऊ से दरियाबाद के लिये बस भी उस समय चालू हुई थी । दशहरा बाग में एक अस्थाई चौकी भी बनाई गयी थी । पानी के लिये सैकड़ो बाल्टी कुंए में डाली जाती थी तो डोरी में फंस कर जो बाल्टी कुये में गिर जाती थी उसको निकाल कर स्व नंदा लाल जैन के यहां एकत्रित किया जाता था । जब पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध हुआ तो वही व बाल्टी बेच कर मिले धन व चढ़ावे की धनराशि को सहयोग राशि के रूप में देश को दी गयी थी ।

कुंए के पास बैठे मिले खेतो में काम करने वाले पठखानी मोहल्ला निवासी सोनी व राजित राम बताते है कि दस वर्ष से हम इन खेतो में काम कर रहे है । अभी कुछ दिन पहले कानपुर से लोग नहाने आये थे। अभी भी कभी कभी यहां लोग स्नान करने आते है ।

आज पांच दशक बाद यह कुआं भी देख रेख के अभाव में अपना अस्तित्व खो चुका है जिले का यह कोई अकेला कुआं नही जो बदहाली का शिकार है जिले के अनगिनत कुएं आज अपनी पहचान खो चुके है।

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