चुनाव नतीजे 2022: उत्तराखंड की राजनीति में चर्चित हैं ये पांच मिथक, कुछ टूटे कुछ कायम रहे
देहरादून, अमृत विचार। उत्तराखंड चुनाव के नतीजों में तीन सबसे बड़े उलटफेर सामने आए। उत्तराखंड की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खटीमा से चुनाव हार गए। वहीं लालकुआं से कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और गंगोत्री सीट से आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद का चेहरा अजय कोठियाल को …
देहरादून, अमृत विचार। उत्तराखंड चुनाव के नतीजों में तीन सबसे बड़े उलटफेर सामने आए। उत्तराखंड की भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खटीमा से चुनाव हार गए। वहीं लालकुआं से कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और गंगोत्री सीट से आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद का चेहरा अजय कोठियाल को भी हार का मुंह देखना पड़ा। इन नतीजों के बीच उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से जुड़े पांच में से तीन मिथक टूट गए जबकि दो मिथक बरकरार रहे, जिनका ताल्लुक पुष्कर सिंह धामी और आप नेता रिटायर्ड कर्नल अजय कोठियाल से है।
पहला मिथक: उत्तराखंड में कभी भी किसी दल की सरकार दोबारा नहीं बनी। उत्तराखंड के 20 साल के चुनावी इतिहास में पहले चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनी थी, फिर 2007 में भाजपा की सरकार बनी। 2012 में फिर कांग्रेस सत्ता में आई तो 2017 में भाजपा ने सत्ता में वापसी की। पांचवे विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बहुमत हासिल कर यह मिथक तोड़ दिया और लगातार दूसरी बार सरकार बनाने के हकदार बनी।
दूसरा मिथक: गंगोत्री सीट पर जिस पार्टी का उम्मीदवार जीतता है, उसकी सरकार बनती है। इस बार गंगोत्री सीट से भाजपा के सुरेश चौहान ने जीत दर्ज की है और राज्य में भाजपा 70 में से 47 सीटों पर बढ़त बनाती दिख रही है, ऐसे में भाजपा की सरकार बनना तय माना जा रहा है।
तीसरा मिथक: रानीखेत सीट से जिस पार्टी का उम्मीदवार जीतता है, वो पार्टी सत्ता में नहीं पहुंच पाती है। इस बार यहां से भाजपा के प्रमोद नैनवाल 2000 से ज्यादा वोटों से जीते हैं और भाजपा को ही उत्तराखंड की सत्ता दोबारा मिलना तकरीबन तय हो गया है। ऐसे में यह मिथक भी टूट गया है।
चौथा मिथक : कहा जाता है कि उत्तराखंड में जो भी नेता शिक्षा मंत्री बना, वह चुनाव में हार गया। फिर चाहे वह तीरथ सिंह रावत, नरेंद्र भंडारी, गोविंद सिंह बिष्ट, खजान दास और मंत्री प्रसाद नैथानी हों , शिक्षा मंत्री रहते हुए जब चुनाव लड़े तो हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन इस बार गदरपुर से अरविंद पांडे ने जीत दर्ज कर यह मिथक तोड़ दिया।
पांचवा मिथक: मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव लड़ने वाले नेता कभी भी विधान सभा चुनाव नहीं जीते। 2002 चुनाव जीतकर एनडी तिवारी सीएम बने, लेकिन फिर उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। 2007 में बीसी खंडूरी मुख्यमंत्री बने और 2012 में वह चुनाव हारे। 2012 में कांग्रेस से चुनाव जीते विजय बहुगुणा ने 2017 में चुनाव नहीं लड़ा। हरीश रावत ने 2017 में दो सीटों (किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण) से चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं सके। भाजपा के दो सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत व तीरथ सिंह रावत इस बार चुनाव मैदान में कूदे ही नहीं। ऐसे में मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी इस मिथक को तोड़ नहीं पाए।
