हल्द्वानी: चुनावी मौसम विज्ञानी, मौसम का अनुमान नहीं लगा पाए
नरेन्द्र देव सिंह, अमृत विचार, हल्द्वानी। उत्तराखंड राज्य के चुनावी मौसम विज्ञानी यशपाल आर्य इस बार राजनीति के मौसम के मिजाज का अनुमान नहीं लगा पाए। यशपाल आर्य मौका देखते ही पार्टी बदलते हैं और दूसरी पार्टी में जाकर सत्ता सुख भोग लेते हैं। हालांकि इस बार राजनीतिक पैंतरा बदलना उनको बहुत भारी पड़ा। विधानसभा …
नरेन्द्र देव सिंह, अमृत विचार, हल्द्वानी। उत्तराखंड राज्य के चुनावी मौसम विज्ञानी यशपाल आर्य इस बार राजनीति के मौसम के मिजाज का अनुमान नहीं लगा पाए। यशपाल आर्य मौका देखते ही पार्टी बदलते हैं और दूसरी पार्टी में जाकर सत्ता सुख भोग लेते हैं। हालांकि इस बार राजनीतिक पैंतरा बदलना उनको बहुत भारी पड़ा।
विधानसभा चुनाव से कुछ समय पूर्व ही यशपाल आर्य ने अपने बेटे संजीव आर्य के साथ भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। यशपाल बाजपुर से विधायक थे और राज्य में कैबिनेट मंत्री थे तो वहीं संजीव आर्य भी नैनीताल से विधायक थे। इन दोनों ही पिता और पुत्र ने पहले से ही भाजपा को छोड़ने का संकेत दे दिया था। स्वयं पुष्कर सिंह धामी ने यशपाल को मनाने की कोशिश की थी।
इन दोनों ने जब पार्टी छोड़ी तो भाजपा के पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं ने बाहरी नेताओं को पार्टी में शामिल नहीं करने के लिए मुहिम भी चला दी थी। भाजपा नेतृत्व को भी किरकिरी का सामना करना पड़ा था। ऐसा पहली बार नहीं था कि यशपाल परिवार ने चुनाव से पहले पार्टी छोड़ दी हो। इससे पहले भी साल 2017 में यशपाल आर्य ने अपने बेटे संजीव के साथ कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। हालांकि तब वे लोग काफी फायदे में रहे थे।
यशपाल बाजपुर से चुनाव जीते और कैबिनेट मंत्री बने। इधर संजीव ने नैनीातल से चुनाव लड़ा और पहली बार विधायक बन गए। इस बार जब ये दोनों कांग्रेस में शामिल हुए तब राजनीतिक गलियारों में जुमला उछलने लगा था कि इस बार कांग्रेस की सरकार बनते देख इन दोनों फिर से पाला बदल दिया है। हालांकि इस बार आर्य परिवार का दांव उल्टा पड़ गया। संजीव नैनीताल से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव हार गए तो वहीं यशपाल बाजपुर से बहुत मुश्किल से चुनाव जीत पाए। जीत का अंतर उनके कद के अनुसार नहीं था।
हरीश ने दिखाया था मुख्यमंत्री बनाने का सपना
हल्द्वानी। हरीश रावत ने यशपाल आर्य को मुख्यमंत्री बनाने तक का सपना दिखा दिया था। हरीश खुले मंच से बोलते थे कि उत्तराखंड में किसी दलित को मुख्यमंत्री बनना चाहिए। हालांकि लोगों का मानना था कि अगर कांग्रेस चुनाव जीत जाती है तो यशपाल को मुख्यमंत्री तो नहीं उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। हालांकि कांग्रेस चुनाव हार गई और सारे सपने धरे के धरे रह गए।
हरक को भी हुआ भाजपा से बैर लेने का नुकसान
हल्द्वानी। हरक सिंह रावत को भी भाजपा से बैर लेना भारी पड़ गया। उनकी बहु अनुकृति गुंसाई चुनाव हार गईं। वह पांच साल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। हल्द्वानी में नरेंद्र मोदी ने स्वयं उनके कंधे पर हाथ रखा था। तब माना जा रहा था कि वह भाजपा नहीं छोड़ेंगे। हालांकि बाद में उनके तेवर देखकर भाजपा ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया।
इन्हें मिला भाजपा के साथ रहने का फायदा
हल्द्वानी। भाजपा इधर कांग्रेस को छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा सितारगंज से चुनाव जीत गए। सतपाल महाराज भी चौबट्टाखाल से विधानसभा पहुंच गए। सुबोध उनियाल नरेंद्रनगर से चुनाव जीते। हालांकि कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन की पत्नी देवयानी खानपुर से चुनाव हार गईं।
