अल्मोड़ा: प्याज की पौध बनी आजीविका का जरिया
अल्मोड़ा, अमृत विचार। पर्वतीय अंचल में इन दिनों प्याज की पौध के साथ ही बीज विक्रय काश्तकारों की आजीविका का जरिया बना है। जिला मुख्यालय के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के काश्तकार अपनी नर्सरी में उगाए गए पौधों को विक्रय के लिए ला रहे हैं। इन पौधों के साथ ही शाक-भाजी के अन्य बीजों को बेच कर अपनी आजीविका चला रहे हैं।
जिले के विभिन्न विकास खंडों हवालबाग, ताकुला, द्वाराहाट, चौखुटिया, भिकियासैंण, स्याल्दे, सल्ट, ताड़ीखेत, लमगड़ा, धौलादेवी, भैंसियाछाना में प्याज का उत्पादन बहुतायत मात्रा में होता है। वहीं, इन दिनों पत्ता व फूल गोभी के पौधों का भी रोपण किया जाता है। इसी के मद्देनजर जिला मुख्यालय के समीपवर्ती गांवों के काश्तकार अपनी नर्सरी में तैयार इन पौधों को विक्रय के लिए ला रहे हैं।
सालों से अपनी नर्सरी में तैयार प्याज के पौधों की बिक्री कर रहे जिला मुख्यालय के समीपवर्ती विकास खंड हवालबाग अंतर्गत ग्राम बल्टा के राजू मेहता ने बताया कि वह प्रतिदिन करीब 150 गड्डी प्याज के पौध की बिक्री कर लेते हैं। इससे वह प्रतिदिन 1500 रुपये कमा लेते हैं। साथ ही सीजन के दौरान इसी से अपनी व परिवार की आजीविका चलाते हैं। पौधों के साथ ही इन काश्तकारों द्वारा सब्जियों के बीजों जैसे मूली, लाही, मेथी, पालक वगैरह के बीजों का भी विक्रय भी किया जा रहा है।
अक्टूबर-नवंबर में तैयार की जाती है नर्सरी
अल्मोड़ा। पहाड़ में अक्टूबर नवंबर माह में प्याज की नर्सरी के लिए कुछ वर्गमीटर का खेत तैयार किया जाता है। फिर इसमें बीजारोपण किया जाता है। करीब दो माह के बाद यह पौधरोपण के लिए तैयार होते हैं। फिर काश्तकार इन्हें गड्डी बनाकर बाजार में विक्रय के लिए लाते हैं। प्याज की नर्सरी तैयार करने में काफी मेहनत की आवश्यकता होती है।
जिले में करीब 270 हेक्टेयर में प्याज की खेती की जाती है। काश्तकारों के हितों के लिए विभाग व शासन गंभीर है। काश्तकारों को कीटनाशक दवा 60 प्रतिशत सब्सिडी पर उपलब्ध कराई जाती है। साथ ही सब्जी उत्पादकों को समय-समय पर बेहतर तकनीक से उत्पादन बढ़ाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
- एसके शमर, मुख्य उद्यान अधिकारी, अल्मोड़ा
