हल्द्वानी: पलायन भुला रही है परंपरा
पहाड़ों में लगाने वाले जागर के बारे में नहीं जानती नई पीढ़ी
नई पीढ़ी के बच्चे भूलते जा रहे अपनी संस्कृति
हल्द्वानी, अमृत विचार। पहाड़ों से पलायन करके शहरों में बसे उत्तराखंडी समाज के लोग समय के साथ-साथ हाईटेक होते जा रहे हैं। जिस कारण वे अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपरा से दूर होते जा रहे हैं। उत्तराखंडी समाज की ऐसी ही परंपरा का हिस्सा है जागर। देवी-देवताओं को जगाने के लिए आज भी गांवों में जागर लगाई जाती है। इसके तहत समाज के लोग देवी-देवताओं को मनाते हैं। पर पहाड़ो से पलायन कर चुके लोग इस परंपरा से दूर होते जा रहे हैं।
जबकि यह हमारी प्राचीन पद्धति जनमानस में काफी प्रचलित हुआ करती थी। पूर्व में लोग अपने मानसिक व शाररिक समस्याओं का निराकरण जागर लगाकर किया करते थे। पर अब नई पीढ़ी को इस पद्धति के बारे में कोई जानकारी नहीं है। जिससे लोग अपनी इस परंपरा से दूर होते जा रहे हैं। जहां कुछ लोग इसे पूरी तरह नकार चुके हैं वही कुछ लोग जब अत्यधिक परेशान होते हैं, कही कुछ समाधान नजर नहीं आता है तब इस ओर आते हैं और अपना समाधान ढूंढने की कोशिश करते हैं। पर नई पीढ़ी इन सब से वंचित है। उन्हें इस सब बातों का थोड़ा सा भी ज्ञान नहीं है।
कुछ जागरियों को कहना है कि इसमें थोड़ा बहुत दोष माता-पिता का भी है जिन्हें इस प्रक्रिया में विशवास नहीं है और वे अपने बच्चों को भी अपनी परंपराओं के बारे में कुछ नहीं बताते हैं। उनका कहना है कि आधुनिक पीढ़ी के पढ़े-लिखे लोग अब कुमाउंनी जागर जैसी परम्पराओं पर कम ही विश्वास करते हैं और इसको अंधविश्वास मानते हैं। लेकिन उत्तराखंड में जागर लगाते हुये जिस प्रकार देवता का आह्वान किया जाता है। इस प्रकार के अनुष्ठान विश्व भर में किसी न किसी समय प्रचलित रहे हैं। वैसे भी अंधविश्वास और श्रद्धा में बहुत थोड़ा सा ही अन्तर होता है, जिसे उसको जानने वाला ही महसूस कर सकता है।
