हल्द्वानी: खूंखार हुए जंगली जानवर, ढाई दशक में जानलेवा हमलों की तीन गुना हुई रफ्तार
गुजरे 23 सालों में 1060 लोगों ने वन्यजीवों के हमले में गंवाई जान, 5 हजार से ज्यादा घायल
वर्ष 2000 में हुई थी 30 की मौत, 2022 में यहां आंकड़ा बढ़कर 82 तक पहुंचा
हल्द्वानी, अमृत विचार। उत्तराखंड के जंगल देखने में जितने सुंदर हैं, अंदर से उतने ही खतरनाक हैं। इन जंगलों में रहने वाले खूंखार जानवर प्रदेश की जनता के लिए घातक हो गए हैं। इनके हमलों में राज्य गठन से अब तक 1,060 लोग जान गंवा चुके हैं। वहीं, करीब 5,135 लोग घायल हो चुके हैं।
9 नवंबर 2000 में उत्तराखंड गठन के बाद राज्य में तेंदुए, हाथी, बाघ, भालू, सांप और अन्य जंगली जानवरों के हमलों में लोगों के मरने का आंकड़ा तीन गुना तक बढ़ गया है। वर्ष 2000 में 30 लोगों की मौत से शुरू हुआ सिलसिला अब 87 तक पहुंच गया है। वहीं, 56 से शुरू हुई घायलों की संख्या अब 348 पहुंच गई है।
अगर आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले वर्ष 2022 में जानवरों के हमलों से मरने वालों की संख्या 82 रही, जबकि घायलों की संख्या 325 थी। इस वर्ष अब तक 6 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 1 तेंदुआ, 1 हाथी, 4 बाघ के हमले में मारे गये हैं और 23 लोग घायल हुए हैं। 2022 में घायलों की संख्या 325 रही। आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत गौनिया ने कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के सभी वन प्रभागों से सूचना मांगी थी। जिसमें इस सूचना का पता चला है।
तेंदुए के बाद सबसे ज्यादा घातक गजराज
राज्य में जहां तेंदुए के हमले से मरने और घायल होने वालों का आंकड़ा बढ़ा है। वहीं, तेंदुए के बाद गजराज के गुस्से ने भी लोगों को मौत के घाट उतारा है। तेंदुए के हमले में अब तक 501 लोगों की मौत हुई और हाथियों के हमले में 208 को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा।
1.08 अरब से अधिक का दिया मुआवजा
मानव वन्यजीव संघर्ष के अंतर्गत वन विभाग को वर्ष 2012-13 से 2022-23 तक करीब 11863.51 लाख का बजट मिल चुका है। जिसके सापेक्ष विभाग 10890.67 लाख की धनराशि व्यय कर चुका है। 937.50 लाख की धनराशि ब्याज रहित शासन को भेजी जा चुकी है। जबकि नियोजन कार्यालय स्तर पर 35.34 लाख की धनराशि अवशेष है। वर्ष 2000 से 2011-12 तक राज्य में मानव वन्यजीव संघर्ष राहत वितरण निधि नियमावली लागू नहीं थी। नवंबर 2012 से राज्य में लागू की गई।
