हल्द्वानी: कर्मचारियों के सरकारी आवास का काम कर रहे हैं सालों पुराने स्टोर रूम  

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

जर्जर भवनों में रहने को मजबूर सिंचाई विभाग के कर्मचारी

टपकने वाली छतें और सीलन से भरी दीवारें बरसात में खड़ी करती हैं मुसीबत कर्मचारियों ने लगाए विभाग के जेई पर लापरवाही के आरोप टाट - पट्टे और प्लास्टिक से किया है छतों और दीवारों को कवर

हल्द्वानी, अमृत विचार। लगभग तीन दशक पहले बनाए गए स्टोर रूम अब सिंचाई विभाग के कर्मचारियों के लिए सरकारी आवास का काम रहे हैं। कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर टिन के बने इन जर्जर कमरों में रहने को मजबूर हैं।

स्टोर रूम के साथ ही कुछ अन्य भवनों में भी छतें टपक रहीं हैं और दीवारों में सीलन हो रही है। कर्मचारियों ने छतों को टाट - पट्टे और प्लास्टिक से कवर कर किया है। उनका कहना है कि कई बार विभाग के जेई कमरों के मरम्मतीकरण के  लिए नापजोख करने आते हैं लेकिन इसके बाद कोई कार्यवाही नहीं होती है।

बाद में पूछने पर बजट नहीं होने की बात कही जाती है। साथ ही विभाग के अधिकारियों को इस बाबत कई बार पत्र लिख दिया लेकिन उनके स्तर पर भी कोई कार्यवाही नहीं की जाती है। इन कमरों में अधिकांश कर्मचारी चतुर्थ श्रेणी और कुछ क्लर्क के पद पर सेवारत हैं।

कर्मचारियों का कहना है कि उनके वेतन से आवास भत्ते की कटौती की जाती है लेकिन इसके बावजूद वह ऐसे जर्जर कमरों में रहने को मजबूर हैं। कमरों के मरम्मतीकरण के लिए विभागीय बजट आता है लेकिन कई बार प्रार्थना पत्र लिखने के बाद भी अधिकारी बजट नहीं होने का हवाला देते हैं। अधिकांश कर्मचारियों के स्कूल जाने वाले छोटे - छोटे बच्चे हैं जिस कारण बरसात में उनका अध्ययन भी प्रभावित होता है।

कर्मचारियों और पारिवारिक सदस्यों से बातचीत -

बरसात में छतों से पानी टपकने लगता है। कई बार अधिकारियों को पत्र दिया लेकिन आज तक कार्यवाही नहीं हुई। टिन में जंग लगी हुई है और पानी टपक रहा है। बीते 24 साल से यहां रह रहे हैं। बरसात में छत के टपकने पर कमरे में बर्तन रखने पड़ते हैं। सीलन से बचने के लिए दीवारों में प्लास्टिक कवर के टल्ले लगाए हैं और छतों में भी प्लास्टिक कवर लगा रखा है लेकिन फिर भी बरसात में अंदर पानी भर जाता है। पानी भी नहीं आता है। कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है। - मुन्नी देवी, कर्मचारी की माता

सिंचाई विभाग में 13 साल से सेवारत हूं। कई बार एप्लिकेशन दे दी लेकिन प्रत्येक बार बजट नहीं होने का बहाना दिया जाता है। निजी खर्च पर काम करवाया है लेकिन नई छत डालने और जर्जर दीवारों को ठीक करने का खर्च वहन नहीं कर सकते। टपकते हुए पानी से बचने के लिए छत में प्लास्टिक कवर और लकड़ी का टेक लगा रखा है। बड़े अधिकारियों के आवास का मरम्मतीकरण समय पर कर दिया जाता है लेकिन निम्न वर्ग के कर्मचारियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। विभाग के जेई का बहुत ही लापरवाह रवैया है। - राकेश कुमार, कर्मचारी 

छत की टिन भी गली हुई है और इसके नीचे निजी खर्च पर लगाई हुई प्लाई भी सड़ गई है। खिड़कियों और दरवाजों की लकड़िया सड़ी हुई हैं। अधिकांश काम निजी खर्च पर किया लेकिन पूरे घर की मरम्मत का खर्च वहन नहीं कर सकती हूं। मेरे सर पर तीन छोटे बच्चों की जिम्मेदारी है।  अधिकारी निजी खर्च पर काम करने को कहते हैं। वेतन से 25 सौ रुपये आवास भत्ते की कटौती की जाती है। लेकिन सरकारी आवास के नाम पर जर्जर भवनों में रहने को मजबूर हैं। - राधा, कर्मचारी


बरसात में कमरों के अंदर सीलन पैदा होती है जिस कारण बहुत दिक्कतें होतीं हैं। बारिश होने पर अंदर पानी भर जाता है। नालिया उफान मारने लग जाती हैं जिससे घरों के अंदर भी पानी घुस जाता है। पुराने जर्जर भवन में बनाए गए पब्लिक टॉयलेट में कर्मचारियों का परिवार जाने को मजबूर है। इस कारण महिलाओं और बच्चों को बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। - नीला पनेरू, कर्मचारी की पारिवारिक सदस्य

यह भी पढ़ें: Chardham Yatra 2023: मौसम खराब होने के कारण केदारनाथ यात्रा स्थगित की गई

 

संबंधित समाचार