नैनीताल: अमेरिकी मिशनरी ने 1858 में बनवाया था ऐतिहासिक मेथोडिस्ट चर्च
चन्द्रेक बिष्ट, नैनीताल, अमृत विचार। अंग्रेजों की ओर से बसाया गया नैनीताल आज भी अपने भवनों व यहां की खूबसूरती के लिए जाना जाता है। यह शहर सर्वधर्म समभाव के लिए भी जाना जाता है। नयना देवी मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद व मेथोडिस्ट चर्च एक साथ होने के कारण लोगों के लिए कौतूहल भी पैदा करते हैं।
नैनीताल के मल्लीताल माल रोड में बने मेथोडिस्ट चर्च भी क्रिश्चियन समाज के लिए महत्वपूर्ण है। इस ऐतिहासिक चर्च की नींव वर्ष 1858 में रखी गई थी। इसके अलावा यहां बने कैथोलिक व सेंट जोन्स चर्च भी क्रिसमस पर सरोवर नगरी की खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। मेथोडिस्ट चर्च में हर साल नवंबर के आखिरी रविवार से क्रिसमस के कार्यक्रमों की शुरुआत हो जाती है।
क्रिसमस की पूर्व संध्या पर 24 दिसंबर को चर्च में केक काटा जाता है और क्रिसमस के रोज प्रार्थना होती है। इसी तरह तल्लीताल में अंग्रेजी शासनकाल में बने तल्लीताल के कैथोलिक चर्च में भी क्रिसमस की पूर्व संध्या पर 24 दिसंबर को चर्च में केक काटा जाता है और क्रिसमस के रोज प्रार्थना होती है। नैनीताल के पांच बडे चर्चों में भी क्रिसमस के कार्यक्रम होते हैं। क्रिसमस के साथ ही थर्टी फर्स्ट करीब होने के कारण देशभर से पर्यटक यहां पहुंचते हैं।
इतिहासकारों की मानें तो मल्लीताल माल रोड मेथोडिस्ट चर्च को एशिया के पहले मेथोडिस्ट चर्च के रूप में स्थापित हुआ है। 10 मई 1857 को अमेरिकी मेथोडिस्ट मिशनरी के विलियम बटलर भारत पहुंचे थे। वह संयुक्त अवध प्रांत के बरेली में रहने लगे। वर्ष 1857 के गदर के दौरान शुरू हुए आंदोलनों के दौरान बरेली के कमांडर निकलसन ने बटलर को सुरक्षा की दृष्टि से नैनीताल जाने को कहा।
22 सितंबर 1858 को विलियम बटलर नैनीताल पहुंचा। नैनीताल पहुंचने के बाद बटलर ने कमिश्नर हेनरी रैमजे के सहयोग से वर्ष 1858 में मल्लीताल स्थित पुराने रिक्शा स्टैंड के पास चर्च की स्थापना की। इस चर्च को तैयार होने में लगभग दो साल का समय लगा। 1860 में पहली बार इस चर्च में क्रिसमस की प्रार्थना सभा हुई। तब से आज तक इस चर्च में प्रार्थना सभाओं के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इन सभाओं में नैनीताल आने वाले सैलानी भी शामिल होते हैं।
ऐतिहासिक चर्च को तैयार होने में दो साल का समय लगा : रावत
इतिहासकार प्रो. अजय रावत के अनुसार मेथोडिस्ट चर्च की नींव वर्ष 1858 में रखी गई थी। 10 मई 1857 को अमेरिकी मेथोडिस्ट मिशनरी के विलियम बटलर भारत पहुंचे थे। वह बरेली रहने लगे। वर्ष 1857 के गदर के दौरान शुरू हुए आंदोलनों के चलते बरेली के कमांडर निकलसन ने बटलर को सुरक्षा की दृष्टि से नैनीताल जाने की सलाह दी, जिसके बाद 22 सितंबर 1858 को विलियम बटलर नैनीताल पहुंचे।
नैनीताल पहुंचने के बाद बटलर ने तत्कालीन कमिश्नर सर हेनरी रैमजे के सहयोग से वर्ष 1858 में मल्लीताल स्थित पुराने रिक्शा स्टैंड के पास चर्च की स्थापना की। इस ऐतिहासिक चर्च को तैयार होने में लगभग दो साल का समय लगा। इसे काउंटी चर्च के रूप में भी जाना जाता है। 16 वीं सदी से पहले तक क्रिसमस का त्यौहार छह दिसंबर को मनाया जाता था। 14वीं और 15वीं शताब्दी में धार्मिक आंदोलनों में सेंट निकोलस को अत्यधिक महत्व दिया गया।
