प्रयागराज : मामले में पीड़िता की सहमति का संदेह होने पर आरोपियों को किया बरी

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Edited By Amrit Vichar
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अमृत विचार, प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 के एक कथित दुष्कर्म मामले में 4 लोगों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि मामले में पीड़िता सहमति देने वाला पक्ष प्रतीत होती है। इसके साथ ही अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों, ट्रायल के दौरान प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों, पक्षकारों के अधिवक्ताओं द्वारा दी गई दलीलों और ट्रायल कोर्ट के फैसले की सावधानीपूर्वक जांच करने पर कोर्ट ने सरकार की अपील को प्रवेश के चरण में ही खारिज कर दिया।

यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए पारित किया। तथ्यों के अनुसार 22 अप्रैल 2009 को शिकायतकर्ता मुन्ना लाल ने कानपुर देहात के एक पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धाराओं के तहत बलवान सिंह, अखिलेश, सिया राम और विमल चंद्र तिवारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाई। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के अनुसार पीड़िता के चिकित्सीय जांच करने वाली महिला डॉक्टर की राय में पीड़िता को यौन संबंध बनाने की आदत थी और शरीर पर कोई बाहरी चोट न होने के कारण दुष्कर्म के बारे में कोई निश्चित राय नहीं दी गई। इन्हीं आधारों पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को बरी कर दिया। ट्रायल कोर्ट के फैसले को सरकार ने इस आधार पर हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी कि अभियोजन पक्ष ने मामले को पूरी तरह से सिद्ध किया था और पीड़िता ने भी आरोपियों द्वारा उसके साथ दुष्कर्म करने की पुष्टि की थी।

कोर्ट ने मामले की जांच करते हुए पाया कि घटना के 15 दिन बाद प्राथमिकी दर्ज की गई और अभियोजन पक्ष ने इस देरी का कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया। पीड़िता अपनी गवाही के अनुसार 25-26 दिनों तक आरोपी बलवान के साथ रही। फिर भी उसने यात्रा के दौरान राहगीरों से सहायता मांगने के लिए कभी कोई शोर नहीं मचाया या आरोपी के परिवार के सदस्यों की पत्नी से शिकायत नहीं की, जिनके घर में उसे कथित रूप से बंधक बनाकर रखा गया था। अंत में ट्रायल कोर्ट के फैसले पर संदेह करने का कोई कारण न पाते हुए कोर्ट ने सरकार की अपील को प्रारंभिक चरण में ही खारिज कर दिया।

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