हल्द्वानी में समय चक्र में गुम लल्ला मियां के घोड़े, चांद और सितारे

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

भूपेश कन्नौजिया, हल्द्वानी। रियाज हुसैन उर्फ लल्ला मियां के सामने ही बच्चों के चांद, तारों, घोड़े और सितारों की दुनिया सिमटने को है। वक्त के साथ बढ़ती रही इस सिकुड़न ने कम होने के नाम तो लिया नहीं, अब यह सिकुड़न लल्ला मियां के धंधे को करीब-करीब खत्म करने पर आमादा है। लल्ला मियां के …


भूपेश कन्नौजिया, हल्द्वानी। रियाज हुसैन उर्फ लल्ला मियां के सामने ही बच्चों के चांद, तारों, घोड़े और सितारों की दुनिया सिमटने को है। वक्त के साथ बढ़ती रही इस सिकुड़न ने कम होने के नाम तो लिया नहीं, अब यह सिकुड़न लल्ला मियां के धंधे को करीब-करीब खत्म करने पर आमादा है। लल्ला मियां के माथे पर पड़ी लकीरें उनकी उम्र की गवाही देती हैं साथ ही करीब सौ साल के उनके बताशों के व्यापार के तजुर्बे का भी।

बात तब थी जब उनके हाथों से बने बताशों कि मिठास देश की सीमाओं से पार पहुंचती थी, तब धारचूला, तकलाकोट से तिब्बत तक हिंदुस्तानी चीजों का व्यापार होता था। लल्ला मियां के बताशे भी तब सरहद पार करते थे। इतने सालों में ऐसा पहली बार है जब अपने ही घर में बताशों के साथ ही बच्चों को एक अलग संसार की सैर कराने वाले लल्ला मियां खील-खिलौने और घोड़े, चांद, सितारे समय चक्र के साथ गुम होने को हैं।

रुंधे गले से लल्ला मियां बोले, दीपावली की पहचान खील-खिलौने और बताशों में, पर इस बार वो मिठास कहां? इस बार तो बस रस्म अदाएगी ही है जनाब! हल्द्वानी वनभुलपुरा निवासी रियाज़ हुसैन उर्फ लल्ला मियां अपने कमरे में एकांत में बैठे हुए इतना ही कह पाए और फिर अतीत के पन्ने टटोलने लगे। लल्ला मियां बताते हैं, 1930 में छोटा सा कारखाना शुरू किया, आज देखते ही देखते धंधा खत्म होने को है।

घोड़े, चांद-तारे, भगवान का आकार लिए मीठे खिलौने बच्चों के अंदर त्योहार के प्रति बड़ी उत्सुकता और आनंद पैदा करते थे, मगर अब सब खो सा गया है। चार पीढ़ियों से बताशे-खिलौने बनाने का व्यवसाय जमाए रखा मगर अब हालात ये हैं कि त्योहार में नया कपड़ा तन पर संजोने के लिए भी इस व्यापार से पैसा नहीं कमाया जा रहा, चीड़ की लकड़ी का धुआं फांकते-फांकते घर की चौखट काली पड़ गयी है मगर त्योहार में इतनी रौनक नहीं कि घर के अंदर खुशियों का उजाला फैल सके।

मियां जी आगे बताते हैं कि सन1930 में उनके पिता विलायत हुसैन ने बताशे कारखाने की नींव रखी और उनके इंतकाल के बाद जिम्मेदारी उन्होंने संभाली फिर उम्र के इस पड़ाव में अब जब शरीर थकान से जूझ रहा है तो कारखाने के कामकाज को बेटा इनायत और पोता अमन वारसी संभाल रहे हैं।

अब आलम यह है कि बाजार में बताशों और खिलौने के खरीदार ही नहीं है। पूजा-पाठ में ही लोग बमुश्किल से पाव भर खरीद लेते हैं। पहले के लोग चाय के साथ भी इस्तेमाल करते थे पर अब मधुमेह जैसे रोगों के बढ़ते मरीजों की संख्या देखते हुए लोग कन्नी काटने लगे हैं। लाखों का व्यापार अब हजार तक ही सिमट कर रह गया है। इस बार कोरोना की वजह से आलम यह है कि अभी तक मात्र दस हजार की ही बिक्री हुई है। दूर-दराज से आने वाले दुकानदारों का भी ऑर्डर न के बराबर ही है। इन हालातों में तो लगता है कि अब यह धंधा ज्यादा दिन नहीं चलने वाला।

संबंधित समाचार