डीएसबी के छात्र मछली बेचकर अपनाएंगे स्वरोजगार
नैनीताल, अमृत विचार: डीएसबी परिसर के जंतु विज्ञान विभाग के छात्रों ने महाशीर मछली के सफल उत्पादन के बाद अब इसे बेचकर स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाया है। बायोफ्लॉक फिश टेक्नोलॉजी के माध्यम से विभाग ने 50 किलो महाशीर मछली का उत्पादन किया है, जिसे जल्द ही स्थानीय बाजार में उचित मूल्य पर बेचा जाएगा। इसके अलावा, कुछ मछलियों को नैनी झील में भी छोड़ा जाएगा, ताकि इस दुर्लभ प्रजाति का संरक्षण किया जा सके।
डीएसबी में पिछले एक वर्ष से जंतु विज्ञान विभाग बायोफ्लॉक फिश टेक्नोलॉजी पर कार्य कर रहा है। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से बिना किसी प्राकृतिक जलस्रोत के भी मछलियों का पालन संभव हो पाता है। यह तकनीक विशेष रूप से जल में मौजूद सूक्ष्मजीवों की सहायता से अपशिष्ट को नष्ट कर पानी की गुणवत्ता बनाए रखती है। इससे कम लागत में अधिक मछलियों का उत्पादन किया जा सकता है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डीएस रावत ने बताया कि महाशीर मछली के उत्पादन का मुख्य उद्देश्य इस प्रजाति को पुनः संरक्षित करना है। बताया कि नैनी झील से वर्ष 2000 के बाद महाशीर मछली विलुप्त हो गई थी। इस प्रजाति को पुनर्जीवित करने के लिए जंतु विज्ञान विभाग के छात्रों और शिक्षकों ने विशेष प्रयास किए हैं।
छात्रों को मिलेगा रोजगार का अवसर
डीएसबी परिसर में मत्स्य उत्पादन परियोजना के अंतर्गत छात्रों को मत्स्य पालन से जुड़ी सभी तकनीकी जानकारियां प्रदान की जा रही हैं। इस परियोजना के अंतर्गत छात्रों ने मछलियों को 'केक फूड ऑयल' नामक विशेष प्रोटीनयुक्त आहार प्रतिदिन दिया, जिससे उनकी वृद्धि में तेजी आई। प्रत्येक 15 दिनों में मछलियों के आकार और वजन की जांच की गई। अब जब मछलियां डेढ़ से दो किलोग्राम की हो चुकी हैं, तो उन्हें बाजार में बेचने के लिए तैयार किया गया है। डीएसबी परिसर में उत्पादित 50 किलो महाशीर मछली को स्थानीय बाजार दर के आधार पर बेचा जाएगा। इस बिक्री से प्राप्त आय को छात्रों में वितरित किया जाएगा, ताकि वे मत्स्य पालन को एक संभावित रोजगार विकल्प के रूप में देख सकें। यह पहल न केवल छात्रों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाएगी, बल्कि उन्हें व्यावहारिक अनुभव भी प्रदान करेगी।
संरक्षण और व्यावसायिक पहल का संयोजन
जंतु विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एचसीएस बिष्ट ने बताया कि छात्रों ने बायोफ्लॉक फिश टेक्नोलॉजी के तहत मछलियों के पालन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कहा बायोफ्लॉक तकनीक के माध्यम से छात्रों को मत्स्य पालन की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। अभी तक 50 किलो मछली का उत्पादन हुआ है, जब संख्या 200 से अधिक हो जाएगी तो उन्हें नैनी झील में छोड़ने की योजना है। मत्स्य पालन की यह परियोजना छात्रों के लिए स्वरोजगार का एक नया रास्ता खोल सकती है। यह उन्हें मत्स्य पालन उद्योग की संभावनाओं से अवगत कराने के साथ-साथ स्वयं का व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित करेगी।
स्थानीय बाजार में होगी बिक्री
डीएसबी परिसर में उत्पादित महाशीर मछली की बिक्री स्थानीय बाजार में की जाएगी। इसकी कीमत बाजार दर के अनुसार तय होगी। इस पहल से छात्रों को मत्स्य पालन की व्यावसायिक संभावनाओं को समझने और आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलेगा। इस परियोजना के माध्यम से डीएसबी परिसर एक बार फिर से महाशीर मछली के संरक्षण और व्यावसायिक उत्पादन का प्रमुख केंद्र बन रहा है। छात्रों और शिक्षकों के संयुक्त प्रयासों से यह परियोजना न केवल पर्यावरण संरक्षण में योगदान देगी, बल्कि छात्रों के लिए एक नया व्यावसायिक अवसर भी खोलेगी।
