बोध कथा: सद्गुरु
एक गांव में एक किसान रहता था। किसान अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बहुत प्रसन्न था। किसान के घर में एक गाय थी, जिसे किसान और उसकी पत्नी बहुत प्यार से रखते थे। किसान प्रातः काल खेत पर जाने के समय गाय को भी ले जाता था जो कि पास ही जंगल में चरती रहती थी। शाम को गाय अपने मालिक किसान के साथ वापस आ जाती थी। किसान और उसका परिवार गाय का दूध पीते और गाय की भरपूर सेवा करते थे। जंगल में किसान बार-बार गाय को देखता रहता था कि कहीं दूर तो नहीं चली गई या भटक तो नहीं गई।
एक बार किसान की नजर चूक गई और गाय घने जंगल में चली गई और रास्ता भटक गई। शाम ढलने के करीब थी। गाय ने देखा कि एक बाघ उसकी और दबे पांव बढ़ा आ रहा है। गाय घबराकर दौड़ पड़ी और पास के एक तालाब में चली गई। बाघ भी पीछा करते हुये उसके पीछे-पीछे तालाब में घुस गया। तालाब अधिक गहरा नहीं था। पानी तो कम था पर कीचड़ बहुत था। वह कीचड़ का दलदल था। गाय धीरे-धीरे कीचड़ में धंसने लगी, बाघ के पैर भी कीचड़ में धंसने लगे। गाय और बाघ के बीच दूरी अधिक नहीं थी परन्तु ना तो बाघ आगे बढ़ पा रहा था और ना गाय ही हिल पा रही थी। दोनों के बीच की दूरी तो कम तो हुई पर बाघ कुछ करने की स्थिति में नहीं था। उसके पंजे कीचड़ में घंसे हुये थे। दोनों लगभग गले तक उस कीचड़ में फंस गये, दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। बाघ का भोजन समक्ष होने के बावजूद बाघ उसे पकड़ने में असमर्थ था।
थोड़ी देर बाद गाय ने बाघ से पूछा- तुम्हारा कोई गुरु या स्वामी है। बाघ ने अपने स्वाभाविक अहंकार से गुर्राते हुये उत्तर दिया स्वामी कैसा स्वामी! मैं तो स्वयं इस जंगल का राजा हूं। गाय ने कहा तुम्हारी इस शक्ति का यहां क्या उपयोग है- तुम अपनी शक्ति के बल पर इस कीचड़ से बाहर नहीं निकल सकते। अब बाघ ने गाय से कहा तुम भी मेरी जैसी स्थिति में हो। तुम भी फंसी हो और मरने के करीब हो। गाय ने मुस्कराकर बाघ को उत्तर दिया- ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। शाम को मेरा मालिक किसान घर वापस जायेगा और मुझे नहीं पायेगा तो वह किसान जो कि मेरा मालिक है निश्चित ही ढूंढता हुआ यहां आयेगा और मुझे यहां से निकाल कर ले जायेगा
और वही हुआ, थोड़ी देर बाद किसान गाय को ढूंढता हुआ तालाब के पास आया और गाय को कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले गया। गाय और किसान दोनों एक दूसरे के प्रति कृतज्ञ थे, वो चाह कर भी बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि बाघ दोनों के जीवन के लिये खतरा था।
इस कथा से हमें यह ज्ञान मिलता है कि बाघ अहंकार का प्रतीक है, गाय का मालिक किसान सद्गुरु का प्रतीक है और कीचड़ यह संसार है। इस संसार रूपी कीचड़ से निकलने के लिये हमें अहंकार की नहीं किसी न किसी रूप में एक मित्र अथवा किसी गुरु की आवश्यकता होती है जो हमें इस संसार रूपी संघर्ष में ज्ञान दे कर उससे बाहर निकाल सके ।
अशोक सूरी, आध्यात्मिक लेखक
