हाइड्रोजन बदलेगा परिवहन का भविष्य

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Edited By Anjali Singh
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दुनिया आज ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन के दबाव में घिरी हुई है। प्रदूषण, बढ़ता कार्बन उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता ने मानवता को वैकल्पिक और टिकाऊ ऊर्जा साधनों की ओर मोड़ दिया है। बैटरी आधारित इलेक्ट्रिक वाहनों ने परिवहन क्षेत्र में नई क्रांति की शुरुआत की है, लेकिन अब हाइड्रोजन आधारित गाड़ियां-फ्यूल सेल इलेक्ट्रिक व्हीकल या एफसीईवी-धीरे-धीरे इस क्षेत्र में अपनी जगह बना रही हैं। इन वाहनों से न केवल परिवहन का स्वरूप बदल सकता है, बल्कि यह पूरी ऊर्जा व्यवस्था को भी नई दिशा दे सकते हैं।

भारत भी इस दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है और आने वाले वर्षों में वैश्विक परिदृश्य में अहम भूमिका निभा सकता है। भारत का परिवहन पारंपरिक ईंधन से स्वच्छ, टिकाऊ और बहु-ऊर्जा समाधानों की दिशा में बढ़ रहा है। भारत की सड़कों पर लंबे समय से पेट्रोल और डीज़ल वाहनों का राज रहा है। ये वाहन देश की गतिशीलता का आधार रहे हैं, लेकिन बढ़ते प्रदूषण और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता ने धीरे-धीरे चिंता बढ़ा दी। हाल ही में E20 पेट्रोल को लेकर सार्वजनिक और तकनीकी चर्चाएं तेज़ हो गईं। आम लोगों और विशेषज्ञों ने इसके इंजन संगतता, प्रदर्शन और दीर्घकालिक भरोसे को लेकर सवाल उठाए। ऐसे में यह स्पष्ट हो गया कि केवल पारंपरिक ईंधन में बदलाव-चाहे वह E20 ही क्यों न हो-दीर्घकालीन समाधान नहीं दे सकता।---------- डॉ. शिवम भारद्वाज

हाइड्रोजन वाहनों का संचालन सरल

हाइड्रोजन वाहनों का संचालन सरल दिखता है, लेकिन तकनीक बेहद दिलचस्प है। कार में एक विशेष टैंक में हाइड्रोजन गैस भरी जाती है। जब यह फ्यूल सेल में हवा से आने वाले ऑक्सीजन के संपर्क में आती है, तो रासायनिक प्रतिक्रिया होती है और बिजली उत्पन्न होती है। यही बिजली मोटर को चलाती है। उप-उत्पाद केवल जल वाष्प है-कोई धुआं, कोई कार्बन नहीं। यही कारण है कि हाइड्रोजन वाहनों को भविष्य का वाहक कहा जाता है।

दुनिया का अधिकांश हाइड्रोजन प्राकृतिक गैस से तैयार होता है, जिसे ग्रे हाइड्रोजन कहा जाता है। इसमें भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन होता है। अगर प्राकृतिक गैस से हाइड्रोजन बनाते समय कार्बन कैप्चर तकनीक का इस्तेमाल किया जाए तो यह ब्लू हाइड्रोजन कहलाता है। सबसे टिकाऊ विकल्प है ग्रीन हाइड्रोजन, जो सौर या पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा से इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया द्वारा बनता है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की “ग्लोबल हाइड्रोजन रिव्यू 2024” के अनुसार, 2023 में वैश्विक उत्पादन लगभग 97 मिलियन टन रहा, लेकिन ग्रीन हाइड्रोजन का हिस्सा अभी भी 1 प्रतिशत से भी कम है। यही कारण है कि लागत कम करना और बड़े पैमाने पर ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग में आई तेजी

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग तेजी से बढ़ रही है। शहरों में निजी कारें, सार्वजनिक परिवहन की बसें, ऑटो-रिक्शा और बाइकें इलेक्ट्रिक होने लगी हैं। चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार और सब्सिडी नीतियों ने इसे प्रोत्साहित किया है। लेकिन इन वाहनों की कुछ सीमाएं भी हैं, जैसे लंबी दूरी की यात्रा, चार्जिंग समय और भारी वाहन जैसे ट्रक और बसों में बैटरी की भारी लागत। इन्हीं सबके बीच नीति निर्माताओं और उद्योग जगत ने भविष्य के परिवहन के लिए और अधिक स्वच्छ, टिकाऊ और शक्तिशाली विकल्प तलाशने की प्रक्रिया में हाइड्रोजन वाहनों के लिए खाका तैयार करना शुरू कर दिया। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक लंबी दूरी तय करने में सक्षम है, रिफ्यूलिंग पेट्रोल-डीज़ल जितनी तेज़ होती है और भारी वाहन चलाने में बैटरी की तुलना में अधिक कुशल है।

हाइड्रोजन की कहानी कोई आज की नहीं है। इसकी नींव लगभग दो सौ साल पहले रखी जा चुकी थी। उन्नीसवीं सदी के मध्य में ब्रिटिश वैज्ञानिक सर विलियम ग्रोव ने यह दिखाया कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोजन से बिजली उत्पन्न की जा सकती है। यही सिद्धांत आज की फ्यूल सेल तकनीक की बुनियाद है। 1966 में जनरल मोटर्स ने पहली बार “इलेक्ट्रोवैन” नामक फ्यूल सेल वैन बनाकर इतिहास रचा। यह प्रयोगात्मक वाहन था, लेकिन संभावनाओं का द्वार खोल गया।

1990 के दशक में कनाडा की बैलार्ड पावर सिस्टम्स और जापान की होंडा जैसी कंपनियों ने अनुसंधान को तेज़ किया और 2008 में होंडा ने सीमित स्तर पर एफसीएक्स क्लैरिटी कार बाज़ार में उतारी। असली बदलाव तब आया जब 2014 में टोयोटा ने “मिराई” कार को व्यावसायिक स्तर पर लॉन्च किया। इसके बाद ह्युंडई ने 2018 में नेक्सो पेश की और होंडा ने भी अपने प्रयोग आगे बढ़ाए। आज दुनियाभर में हज़ारों हाइड्रोजन कारें सड़कों पर दौड़ रही हैं।

चुनौतीपूर्ण है भंडारण और परिवहन 

भंडारण और परिवहन भी चुनौतीपूर्ण हैं। हाइड्रोजन हल्की और सक्रिय गैस है, जिसे उच्च दाब वाले टैंकों या अत्यधिक कम तापमान पर तरल रूप में रखना पड़ता है। इसलिए हाइड्रोजन स्टेशनों का निर्माण पेट्रोल पंप की तुलना में महंगा और जटिल है। 2024 तक दुनिया में लगभग 1,000 हाइड्रोजन स्टेशन सक्रिय या निर्माणाधीन थे। जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और चीन प्रमुख केंद्र हैं, जबकि अमेरिका में कैलिफ़ोर्निया इसका केंद्र बना हुआ है।

हाइड्रोजन उत्पादन में भारत की स्थिति

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भारत में स्थिति अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन गति पकड़ रही है। जनवरी 2023 में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन शुरू किया गया, बजट 19,744 करोड़ रुपये। इसका लक्ष्य 2030 तक भारत को ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन और उपयोग में अग्रणी बनाना है। इसी के अंतर्गत 2024 में परिवहन क्षेत्र में पांच पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए गए, जिनमें 37 वाहन और नौ हाइड्रोजन स्टेशन शामिल हैं। ये बसें और ट्रक देशभर के अलग-अलग मार्गों पर चलकर तकनीकी और आर्थिक संभावनाओं का परीक्षण करेंगे। इस पहल में टाटा मोटर्स, एनटीपीसी, रिलायंस, अशोक लेलैंड और कई तेल कंपनियां शामिल हैं।

रेलवे में भी है बड़ी भूमिका

भारत का हाइड्रोजन सफ़र केवल सड़क परिवहन तक सीमित नहीं है। रेलवे ने भी इसमें बड़ा कदम उठाया है। भारतीय रेलवे ने 2025 में जींद-सोनीपत मार्ग पर देश का पहला हाइड्रोजन चालित कोच परीक्षण के दौर से सफलतापूर्वक गुजारा। यह 1,200 हॉर्सपावर इंजन वाला कोच 35 हाइड्रोजन-चालित ट्रेनों के “हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज” मिशन का हिस्सा बनेगा। प्रत्येक ट्रेन का निर्माण अनुमानित 80 करोड़ रुपये है और आधारभूत संरचना के लिए 70 करोड़ रुपये अतिरिक्त। रेलवे ने मौजूदा डीज़ल-इलेक्ट्रिक यूनिट को हाइड्रोजन फ्यूल सेल में बदलने के लिए 111.83 करोड़ रुपये का पायलट प्रोजेक्ट भी शुरू किया है। यह पहल भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर देती है जो रेल परिवहन को पूरी तरह हरित बनाने के लिए प्रयोग कर रहे हैं।

कॉरपोरेट क्षेत्र में भी सक्रिय

कॉरपोरेट क्षेत्र भी इस दिशा में सक्रिय है। टोयोटा किर्लोस्कर मोटर ने 2022 में मिराई कार का पायलट प्रोजेक्ट भारत में शुरू किया था। इसके बाद 2025 में टोयोटा और बेंगलुरु स्थित ओह्मियम इंटरनेशनल ने एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य ग्रीन हाइड्रोजन आधारित पावर सॉल्यूशंस विकसित करना है। इसका मतलब है कि भविष्य में हाइड्रोजन का उपयोग न केवल गाड़ियों में बल्कि डेटा सेंटर, दूरस्थ इलाक़ों और उद्योगों में भी बिजली आपूर्ति के लिए किया जा सकेगा। यह सहयोग ‘मेक इन इंडिया’ की भावना को मज़बूत करता है और दिखाता है कि भारत स्थानीय तकनीक और वैश्विक विशेषज्ञता को जोड़कर आत्मनिर्भर हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।

पेट्रोल-डीजल की तुलना में कम प्रदूषण

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हाइड्रोजन गाड़ियों के लाभ स्पष्ट हैं। पेट्रोल-डीज़ल के विपरीत, इनमें से कोई प्रदूषण नहीं निकलता। बैटरी गाड़ियों की तुलना में इन्हें चार्ज करने की बजाय हाइड्रोजन भरने में सिर्फ़ कुछ ही मिनट लगते हैं। इनकी रेंज भी लंबी होती है, जिससे यह लंबी दूरी की यात्रा और भारी वाहनों के लिए आदर्श विकल्प साबित हो सकती हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि निजी कारों से कहीं अधिक हाइड्रोजन का उपयोग बसों, ट्रकों, ट्रेनों और जहाज़ों जैसे बड़े वाहनों में होगा।

चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं। ग्रीन हाइड्रोजन अभी महंगी है, उत्पादन सीमित है और इन्फ्रास्ट्रक्चर अधूरा है। इसके अलावा बैटरी गाड़ियां पहले से ही बाज़ार में मज़बूत पकड़ बना चुकी हैं। इसलिए नीति और उद्योग जगत को मिलकर हाइड्रोजन तकनीक को किफ़ायती और व्यवहार्य बनाना होगा। हालांकि, भारतीय नीति निर्माता और उद्योगपति इस दिशा में जिस तरह पहल कर रहे हैं, उससे साफ है कि आने वाले दशक में भारत हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था का अहम केंद्र बन सकता है। आज जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की तलाश में है, भारत ने हाइड्रोजन को अपनी प्राथमिकता में शामिल कर यह संदेश दिया है कि हम केवल उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि नवाचार और नेतृत्व करने वाले राष्ट्र भी बन सकते हैं। चाहे वह सड़कों पर दौड़ती बसें हों, माल ढोते ट्रक, रेल की पटरियों पर दौड़ती ट्रेनें या फिर उद्योगों के लिए ऊर्जा समाधान-हर जगह भारत हाइड्रोजन तकनीक को अपनाने की तैयारी कर रहा है। यह यात्रा अभी लंबी है, लेकिन दिशा स्पष्ट है।