गांव अब खोते जा रहे हैं अपनी पहचान 

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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प्राचीन काल से लेकर अंग्रेजों के आगमन तक अपनी सादगी, साफगोई, भोलापन और अपनी भलमनसाहत के लिए साहित्यिक कृतियों में बहुचर्चित और सुविख्यात हमारे गांव हमारे देश की हर शासन व्यवस्था की मौलिक, प्राथमिक तथा आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर इकाई रहे हैं। इसका अपवाद पश्चिमोत्तर भारत में सिंधु और रावी नदी के तट पर सुविकसित अबसे साढ़े चार हजार साल पुरानी कांस्ययुगीन सिंधु घाटी सभ्यता रही हैं, जो पूर्णतः नगरीय सभ्यता थी। हालांकि इसकी उत्तरवर्ती वैदिक सभ्यता पूरी तरह से ग्रामीण सभ्यता थी।

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ध्यातव्य हो कि पूर्णतः ग्रामीण सभ्यता और संस्कृति के रूप विख्यात वैदिक काल में ही भारतीय ज्ञान-विज्ञान और आध्यात्म के महान ग्रंथों वेदों, अरण्यको और भारतीय आध्यात्मिकता, तार्किकता, दार्शनिकता और बौद्धिकता की पराकाष्ठा को स्पर्श करने वाले उपनिषदों की रचना की गई। यह तथ्य उन शहरी और कस्बाई मानसिकता से ग्रसित और बुरी तरह कुंठित लोगों के लिए चितंनीय और विचारणीय है, जो गांवों में गुजर बसर करने वालों को अनपढ़, असभ्य, गंवार, अशिक्षित और जाहिल समझते हैं। वैदिक काल से लेकर मुगलों के शासनकाल तक लगभग संपूर्ण उत्तर भारतीय शासकों के समय लगभग समस्त भारतीय गांव शासन व्यवस्था की प्राथमिक मौलिक और अक्क्षुण ईकाई रहे हैं। 

उत्तर भारत की तरह सुदूर दक्षिण भारत में चोल, चालुक्य, सातवाहन और चेर राजाओं ने अपनी शासन व्यवस्था में आम लोगों को बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित करने एवं ग्रामीण जन-जीवन में उन्नति और समृद्धि लाने के लिए उत्तम ग्रामीण शासन व्यवस्था का प्रबंधन किया था। वर्तमान दौर के मंत्रिपरिषदों की तर्ज पर ग्रामीण स्तर पर विभिन्न कार्यों को सुव्यवस्थित और सुचारू रूप से संपन्न और संचालित करने के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया गया था। समितियों के माध्यम से दक्षिण भारतीय शासकों ने सर्वश्रेष्ठ ग्रामीण शासन व्यवस्था सुनिश्चित करने का प्रयास किया था। इतिहासकार मेगस्थनीज की प्रसिद्ध पुस्तक इंडिका में उत्तर भारत के विशेष रूप से मगध साम्राज्य के गांवों में पाई जाने वाली उत्तम ग्रामीण शासन व्यवस्था के साथ-साथ उत्तम उन्नत और समृद्ध ग्रामींण जन-जीवन का उल्लेख मिलता है। 

इंडिका में मगध साम्राज्य की उन्नति और समृद्धि के साथ-साथ उत्कृष्ट साहित्यिक और सांस्कृतिक हलचलों का भी पता चलता है। इस प्रकार ऐतिहासिक अवलोकन से पता चलता है कि संपूर्ण भारत में हर प्रकार की शासन प्रणालियों में उत्तम ग्रामीण शासन व्यवस्था पाई जाती रही है। हमारी शासन व्यवस्था की मौलिक स्वाभाविक और प्राथमिक ईकाई रहे गांव पहचान खोते जा रहे हैं। आपसी सहयोग, सहकार, समन्वय, साहचर्य, सामंजस्य और सदियों से हमारे चलन का हिस्सा रही है। संयुक्त परिवार प्रणाली के माध्यम जीवन जीने के आदती ग्रामीण लोकजीवन में अब एकाकी परिवार प्रणाली और एकाकी जीवनशैली तेजी से आगे बढ़ने लगी है। 

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गावों में सदियों से प्रचलित समूहगत और सामूहिक जीवन पद्धति विलुप्त होती जा रही है। आधुनिकीकरण, तकनीकीकरण, शहरीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के साधनों के दुरूपयोग ने गांवों की आपसदारी को न केवल तहस-नहस किया हैं, बल्कि आधुनिकता की इस अंधी दौड़-भाग ने गांवों को आर्थिक सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक रूप से प्रदूषित व कुपोषित किया है। तोता, मैना, कोयल, बुलबुल गौरेय्या और कौवे की बोलियां सुनने के लिए आज हमारे कान तरस जाते हैं। इसके साथ ही साथ गांवों के पर्यावरण और आबो-हवा में स्पष्ट बदलाव देखने को मिल सकता हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के साधनों का बुलेट ट्रेन की रफ्तार से बढ़ता प्रयोग और हाईटेक होते जन-जीवन ने गांवों में मोबाइल कंपनियों के टावरों की संख्या बढ़ा दी है। 

इन टावरों की तरंगों ने तमाम चहचहाती पक्षियों की जान ले ली। अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारतीय गांव अपनी सहज-सरल आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह आत्मनिर्भर थे। अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं और संपूर्ण भारत को बाजार बनाने की मंशा से गांवों की सदियों पुरानी आत्मनिर्भरता के साथ-साथ गांवों की स्वाभाविक सहजता भोलापन, भलमनसाहत और  मौलिकता को तहस-नहस कर दिया। अग्रेंजों ने भारतीय ग्रामीण अर्थतंत्र और अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ रहे भारतीय लोगों की बहुविविध हुनरमंद दस्तकारी, परंपरागत कुशल शिल्पकारी, हुनर और हाथों की जादूगरी से लबरेज हस्तकला को छिन्न-भिन्न कर दिया। 

स्वाधीनता उपरांत भारतीय गांवों को फिर से आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर अनगिनत प्रयास किए गए, परंतु तमाम प्रयासों और प्रयत्नों के बावजूद आज भी हमारे गांव राजधानियों और चमचमाते शहरों की अनुषंगी पूरक और पराश्रित अर्थव्यवस्था के रूप में जीने के लिए अभिशप्त हैं। शहरों और राजधानियों को चमकाने के लिए सारा संसाधन उपलब्ध कराने वाले गांव आज बदहाली और बदत्तरी के शिकार हैं। गावों में गुजर-बसर करने वाले लोगों की आजीविका का साधन आज भी खेती-किसानी और खेती-किसानी पर आधारित लघु कुटीर उद्योग हैं। इसलिए खेती-किसानी को लाभकारी स्थिति में पहुंचाने के लिए व्यावसायिक स्वरूप प्रदान किया जाए तो आज फिर से गांव आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकते हैं। 

गांवों को फिर से सुसज्जित करने के लिए गांवों की प्राकृतिक और स्वाभाविक बुनावट व सजावट की तरफ लौटना होगा। गावों में फिर से साक्षात सहकारी और जिंदा संवाद कायम कर गांवों की मौलिक पहचान फिर से वापस लाई जा सकती है। बाजारवादी चकाचौंध और लगातार विज्ञापनों के शोर ने गंवई व्यंजनों की सुगंध और स्वाद को न केवल क्रूरता से कुचल दिया है, बल्कि हमारे खान-पान की पौष्टिक और प्रचलित परंपरा से हमको बहुत दूर कर दिया हैं। गुड़ भेली से तरह-तरह की बनी मिठाइयों खाद्य और पेय पदार्थों का स्थान पेप्सी, कोका-कोला जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पेय और खाद्य पदार्थों ने ले लिया है। भारतीय गांवों की मौलिक पहचान पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है। जनमानस में गंगा को बचाने के लिए जो तड़प और बेचैनी पाई जाती है उसी तरह की तड़प और बेचैनी गांवों को बचाने के लिए जनमानस के हृदय में पैदा करने की आवश्यकता है। मनोज कुमार सिंह, लेखक