संस्कृति व समृद्ध से पहाड़ की रामलीला

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Edited By Anjali Singh
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उत्तराखंड में रामलीला का एक विस्तृत इतिहास और विशिष्ट पहचान रही है। रामलीला कहीं की भी हो उस पर गोस्वामी तुलसीदास जी के कालजयी ग्रंथ रामचरितमानस का गहरा प्रभाव रहा है। उत्तराखंड की रामलीलाएं भी इससे अछूती नहीं रही हैं, लेकिन थोड़ा बहुत बदलाव करके स्थानीय बोली में मंचन होने के कारण परंपरागत रामलीला में पहाड़ की संस्कृतिक झलक मिलती है।

कुमाऊं के छह जनपदों के तकरीबन सभी नगरों व कस्बों में रामलीला का मंचन होता है। इस मंचन ने लोगों को इसके साथ गहराई से जोड़ा है। यहां की लोक संस्कृति व सभ्यता कितनी विस्तृत है इसकी पहचान उन दोहों व चौपाइयों से होती है, जो मंचन के समय कलाकार अपनी मधुर आवाज और विशिष्ट शैली में गाते हैं। यहां अधिकांश रामलीलाओं का मंचन शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन से प्रारंभ होता है तथा दस दिन तक लगातार मंचन के पश्चात अंतिम दिन राम के राज्याभिषेक के साथ लीला का समापन होता है। 

अनेक स्थानों पर दशहरे के दिन रावण-कुंभकरण आदि के पुतले भी जलाए जाते हैं। वैसे अनंत चतुर्दशी से शरद पूर्णिमा तक का एक माह का समय रामलीला के मंचन का होता है। कई शहरों की लीलाएं छिटककर इस परिधि से बाहर भी चली गई हैं। कुमाऊं में सबसे पहले रामलीला की शुरुआत सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में हुई थी। 1860 में अल्मोड़ा के तत्कालीन सदर अमीन बद्रीदत जोशी ने रामलीला का आयोजन किया था। उसके बाद अल्मोड़ा में रामलीला आयोजन को विस्तृत स्वरूप देने का श्रेय मोतीराम शाह को जाता है। 

सीमांत जिले पिथौरागढ़ में 1897 में तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर देवीदत्त ने रामलीला का आयोजन किया था। बागेश्वर में रामलीला प्रारंभ करने का श्रेय शिवलाल शाह को जाता है, जिन्होंने सबसे पहले 1890 में रामलीला प्रारंभ करवाई। हल्द्वानी में रामलीला की शुरूआत कन्हैया लाल सारस्वत द्वारा की गई थी। उनके द्वारा रामलीला के साथ-साथ दशहरा मेला के आयोजन की परंपरा भी शुरू की गई। 

अब तो कई सालों से हल्द्वानी मे दिन की रामलीला का आयोजन भी किया जाता है। हल्द्वानी में अब महिलाओं द्वारा भी रामलीला का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें सभी पात्र महिलाएं होती हैं। कुमाऊं का हरिद्वार कहे जाने वाले रानीबाग में रामलीला की शुरुआत 1976 में मोहन चंद्र मिश्रा द्वारा की गई थी। कुमाऊं में ज्योलिकोट, काठगोदाम, चोरगलिया, रामनगर, रुद्रपुर, काशीपुर की रामलीलाएं भी प्रसिद्ध हैं।-दीपक नौगांई, लेखक