मॉय फर्स्ट राइड : उत्साह भी था और डर भी
हर इंसान की जिंदगी में कुछ पल ऐसे खास होते हैं, जो हमेशा याद रहते हैं। मेरे लिए ऐसा ही एक पल था-मेरी पहली ड्राइव। वो दिन आज भी मुझे साफ-साफ याद है, जब पहली बार मैंने खुद कार का स्टीयरिंग संभाला था। दिल में उत्साह भी था और डर भी कि कही गलती न हो जाए। सुबह का वक्त था, मौसम थोड़ा ठंडा था और हवा में ताजगी थी। पापा मेरे साथ बैठे थे ताकि मुझे गाइड कर सके। जैसे ही मैंने चाबी घुमाई और इंजन स्टार्ट किया, दिल की धड़कन तेज हो गई धीरे-धीरे एक्सलेटर दबाया और कार आगे बढ़ी। मुझे थोड़ा-थोड़ा डर भी लग रहा था कि कहीं कार मुझसे बेकाबू न हो जाए, कहीं टकरा न जाए, लेकिन मैंने धैर्य बनाए रखा और खुद को समझाया कि मैं कर सकती हूं और मैं आगे बढ़ती गई।
मुझे याद आ रहा था कि जब मैंने पहली बार साइकिल चलाई थी वो भी मेरे लिए ज्यादा आसान नहीं था, लेकिन मैंने हिम्मत जुटाई और कर दिखाया था, लेकिन कार चलाते समय मुझे ऐसा लगा जैसे आज मैंने जिंदगी का एक नया कदम उठा लिया हो। पहले कुछ मिनटों में गाड़ी कई बार झटके खा रही थी, कभी क्लच ज्यादा छोड़ दिया तो कभी गियर गलत लगा, लेकिन पापा मुस्कुरा कर बोले, “कोई बात नहीं हर ड्राइवर ऐसे ही सिखता है”, उनकी बातों से आत्मविश्वास बढ़ा और धीरे-धीरे सब सही होने लगा। जब पहली बार मैंने बिना रुके पूरी रोड पार की, तो दिल खुशी से झूम उठा। -नूर हिना खान, बरेली
