पलछिन: बम से ज्यादा धमक पिता जी की आंखों में थी

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Edited By Anjali Singh
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बात उन दिनों की है, जब हमारी उम्र यही कुछ 10-12 वर्ष की रही होगी। घर में सात भाई बहन हैं। जाहिर है कि खूब धमाचौकड़ी होती थी। त्योहारों पर तो स्कूलों की छुट्टियां हो जाती थीं और दिन भर सिर्फ खेलना व मस्ती करना होता था। दीपावली पर स्कूल की छुट्टियां हो गईं। वैसे तो पिता जी (शिवनाथ सक्सेना) मना करते थे कि घर पर कोई पटाखा नहीं जलाएगा, लेकिन हम बच्चे कहां मानने वाले। उन दिनों बच्चे चटाई, लक्ष्मी बम और सुतली बम के दीवाने होते थे। हम भाई बहन भी सुतली बम खरीद लाए। 
     
सुतली बम बड़ा धमाका करता था। इस बम की एक धमक से घर तो घर, मोहल्ले के घरों के बर्तन गिर जाते थे। पिता जी दफ्तर गए और हमने दिन में पटाखे चलाना शुरू कर दिए। घर के आंगन में ही पटाखा बजा रहे थे। मां जी डांटती थीं लेकिन बच्चों की खुशी देखकर वह भी धमाके में बच्चों की हंसी-खुशी का आनंद लेती थीं। पटाखे चलाते-चलाते शाम के साढ़े पांच बज चुके थे और हमें ध्यान नहीं रहा कि पिता जी का दफ्तर से आने का समय हो गया। हम घर के घेर (आंगन) में पटाखे जला रहे थे कि दरवाजे की कुंडी बजी और पिता जी घर में घुस गए। 

बड़े भाई-बहन तो कुंडी की खटखट से भांप गए और कमरे में भाग गए और किताबें खोलकर पढ़ने लगे। हम पटाखे जलाने में इतना डूबे हुए थे कि पता ही नहीं चला कब पिता जी घेर में हमारे पीछे आकर खड़े हुए। जैसे ही हमने उनकी आंखों में देखा तो बम के धमाके से ज्यादा धमक पिता जी आंखों में थी। अब समझ नहीं आया क्या करें, पटाखे नाली में फेंके और खुद भी गिर गए और पिता जी को देखते हुए कमरे में भागे और बस्ता निकाल कर किताबें खोलकर पढ़ना शुरू कर दिया। इस बार दिवाली पर जब घर गए तो मोहल्ले में बच्चों के सुतली बमों ने पिता जी की याद दिला दी। -डॉ. अतुल सक्सेना