मॉय फर्स्ट राइड: जुनून हो तो सब संभव है
मैं अपने पापा और भाई को गाड़ी चलाते देखती तो मेरे मन में भी आता कि भी अन्य लोगों की तरह गाड़ी चलाते हुए फर्राटा भरूं। पापा से तो गाड़ी सीखने की बात कहने की यह सोचकर ही डर लगता था कहीं पापा यह न कह दें कि शादी के बाद वहां जाकर गाड़ी सीखना, खूब चलाना। यहां रहकर गाड़ी चलाने की तो छोड़ो सीखने की बात भी न सोचना। परंतु मेरे मन में तो गाड़ी सीखने का जुनून सवार था। सो मैंने अपने भाई को मनाया कि वह मुझे गाड़ी चलाना सिखाए, पर भाई भी पापा से डरता था। उसने पहले तो मनाकर दिया पर बहुत समझाने, पर इस शर्त पर मान गया जब पापा कहीं बाहर गए होंगे तभी सिखाऊंगा। एक बार पापा कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर गए, तब मैंने भाई से गाड़ी सीखने की बात कही।
भाई मुझे कार में बैठाकर एक खुले सुनसान मैदान पर ले गया। मुझे बताया कि चाबी लगाकर पहले गाड़ी स्टार्ट करो, फिर क्लच दबाकर गेयर बदलो पहले गेयर पर धीरे-धीरे बढ़ना फिर दूसरा, तीसरा, टॉप गेयर लगाना है। मैंने भाई के बताए अनुसार गाड़ी स्टार्ट कर पहले गेयर में गाड़ी को धीरे से बढ़ाया। फिर अचानक पता नहीं कैसे एक्सीलेटर तेजी से दब गया। एक्सीलेटर दबते ही एकदम से गाड़ी भाग निकली।
हमारे तो हाथ-पैर फूल गए, परंतु मैदान बड़ा होने के चलते गाड़ी बाउंड्री में लड़ती इसके पहले ही भाई ने गाड़ी को स्वयं अपने हाथ में लेकर रोककर मुझे यह कहकर जमकर डांट लगाई कि अगर गाड़ी बाउंड्री में लड़ जाती और तुम्हें चोट लग जाती तो पापा दोनों लोगों की हालत खराब कर देते। मैं डरी-सहमी भाई की डांट सहती रही। भाई ने कहा अब हम तुम्हें कभी कार चलाना नहीं सिखाएंगे। मुझे तो गाड़ी सीखने का जुनून सवार था।
गाड़ी खड़ी कर हम भाई-बहन थोड़ी देर मैदान में घूमें। फिर मैंने हिम्मत करके कहा भाई हमें एक मौका और दो अबकी पिछली गलती नहीं होगी। भाई ने जमकर डांट लगाते हुए स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया। मैं रुंआसी हो गई। मेरा उतरा चेहरा देखकर भाई ने बड़ी हिम्मत कर मुझे पुनः गाड़ी चलाने को दिया। इस बार मैंने गाड़ी स्टार्ट कर क्लच दबाकर पहला गेयर डाला और धीरे-धीरे कुछ दूर तक गाड़ी को चलाया भी।
कुछ हिम्मत बढ़ी तो मैंने गाड़ी को धीरे से घुमाया भी। फिर भाई ने मुझे बैक गियर में गाड़ी चलाने को कहा। उसमें भी मैंने धीरे-धीरे चलाया। पहले दिन तो इतना ही हुआ, पर जैसे हमने हिम्मत से गाड़ी चलाई उससे उस दिन मैं बहुत ही खुश थी। दूसरे दिन फिर उसी तरह पहले गेयर में धीरे-धीरे गाड़ी आगे को चलाई फिर बैक गेयर में धीरे-धीरे पीछे की ओर गाड़ी चलाई। कुछ दिनों तक तो कुछ दूर लगभग आधा, एक किलोमीटर तक ही गाड़ी चलाई। धीरे-धीरे मेरी दूरी बढ़ाती गई। पापा का डर तो हमेशा हम दोनों को लगा रहता था।
पापा के न चाहते हुए भी चुपके-चुपके मैं गाड़ी चलाती थी। एक दिन मैंने सोचा पापा पूरे दिन के लिए बाहर गए हुए हैं तब तक मैं कुछ देर गाड़ी चला कर और हाथ साफ कर लूं। अभी मैं गाड़ी लेकर घर से कुछ दूर तक ही गई थी कि सामने से पापा आ गए। शायद घर में कुछ अपना सामान भूल गए थे। उन्होंने मुझे गाड़ी चलाते देखा वह भी अकेले। मेरा तो खून ही सूख गया। पापा ने कहा गाड़ी से उतरो। पापा ने डांट लगाते हुए कहा यह बताओ कि तुमने यह गाड़ी कब और कहां चलानी सीखी? भाई से, कहकर मैंने पापा को सब सच-सच बता दिया।
मुझे डर था यह सच मेरे साथ-साथ मेरे भाई के लिए मुसीबत बनकर आने वाला है। पापा ड्राइविंग सीट के बगल वाली सीट पर बैठकर बोले गाड़ी चलाकर घर चलो। मैं पापा को बैठाकर डरते हुए, लेकिन बड़े ही सधे हाथों से गाड़ी चला कर गाड़ी को घर तक लेकर आ गई। घर आते ही पापा ने हमारे साथ-साथ भाई की व मां को वह डांट पिलाई कि सबकी हालत खराब हो गई। थोड़ी देर बाद पापा को गुस्सा जब थोड़ा शांत हुआ, तो मैं पापा के लिए गिलास में पानी लेकर पहुंची। पापा ने गिलास मेरे हाथ से लेकर जमीन पर रख दिया और मुझे गले लगाकर रोने लगे।
पापा को रोता देख मेरे भी आंखों से आंसू निकल आए। पापा ने कहा बेटा कौन बाप ऐसा है, जो अपनी बेटी की उन्नति नहीं देखना चाहता। बेटी एक बाप की भी स्थिति को समझने की कोशिश करो। मुझे हमेशा डर लगा रहता था कि गाड़ी सीखते वक्त हमारी बेटी को कहीं चोट लग गई और वह चोट हमारी बेटी की शादी में रोड़ा बन गई, तो हम तो जीते जी मर जाएंगे। बस यही डर मुझे तुम्हें गाड़ी सीखने से रोकता था। आज मेरी बेटी गाड़ी चलाकर जब मुझे घर लेकर आई तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। तुम सबको तो मैं नकली डांट पिला रहा था। वह दिन मेरी जिंदगी का सबसे सुखद दिन था जब पापा ने डांट पिलाने के बाद प्रसन्नता में रोए और मुझे भी रुलाया। इस तरह मैं अपने जुनून से अपने पापा की नालायक बिटिया से उसकी दुलारी बिटिया बन गई। -वंदना सिंह, कानपुर
