हल्द्वानी: कुमाऊं में बैठकी होली का दौर शुरू

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

अमृत विचार, हल्द्वानी। होली के त्योहार में भले ही अभी तीन महीने का वक्त बाकी हो, मगर उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में होली की महफिलें अभी से सजनी शुरू हो गईं हैं। यहां पौष माह के पहले रविवार के साथ ही बैठकी होली का सिलसिला शुरू हो गया है। इस वक्त गायी जाने वाली होली …

अमृत विचार, हल्द्वानी। होली के त्योहार में भले ही अभी तीन महीने का वक्त बाकी हो, मगर उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में होली की महफिलें अभी से सजनी शुरू हो गईं हैं। यहां पौष माह के पहले रविवार के साथ ही बैठकी होली का सिलसिला शुरू हो गया है। इस वक्त गायी जाने वाली होली भक्ति संगीत पर आधारित है।

कुमाऊंनी बैठकी होली नाम से मशहूर कार्यक्रम में घर-घर में होली की महफिलें सजती हैं, जो होली के पर्व तक जारी रहती हैं। रातभर चलने वाली होली की बैठकों की खासियत शास्त्रीय संगीत पर आधारित गायन व वादन होता है। फिलहाल भक्ति संगीत पर आधारित यह होली गायन बसंत पंचमी के बाद श्रृंगार रस में तब्दील हो जाएगा।

शास्त्रीय संगीत पर आधारित कुमाऊंनी बैठकी होली की परंपरा देशभर में अकेली व वर्षों पुरानी है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती आ रही है। होली के तीन महीने पहले से ही कुमाऊं में होली का रंग परवान चढ़ना शुरू हो गया है। कई रागों और सुर- तालों का समावेश लिए कुमाऊंनी होली गायन में अभी भक्तिमय गीत गाए जा रहे हैं।

पौष माह के पहले रविवार से शुरू हुई इस होली में झिझोरी, राग धमाल, जंगला, जंगला काफी, जैजेवंती, खमार, भैरवी, राग दरबारी के अलावा कई रागों को समयबद्व ढंग से गाया जा रहा है। होली के इस सिलसिले में बसंत पंचमी के बाद भक्तिमय बैठकी होली श्रृंगार रस में बदलेगी और शिवरात्री के बाद राधा-कृष्ण के रासरंगों के बखान पर बृज की होली गाई जाएगी।

सेमी क्लासिकल शैली में होली का गायन होता है पश्चिमी संस्कृति के असर से बैठकी होली के जानकार कम जरूर हुए हैं। मगर बैठकी होली ने अपना शास्त्रीय रूप नहीं खोया। गायकों के लिए बैठकी होली साथ बैठने का एक जरिया है। यहां कुमाऊंनी, अवधी व खासतौर पर बृजभाषा में होली का गायन होता है। बृज में 14 व कुमाऊंनी में 16 मात्राओं में होली गायन होता है। कुमाऊंनी होली जग ताल या चांचर में गाई जाती है। जानकार बताते हैं कि होली गायन की शुरूआत अमीर खुसरो के वक्त से हुई थी और अल्मोड़ा में तमाम मुस्लिम भाई भी होली गायन करते थे और वहीं से इसका चलन माना जाता है।– विपिन जोशी, शास्त्रीय संगीत शिक्षक एवं तबला वादक

कुमाऊं में इस होली का अपना अलग ही महत्व होता है। लेकिन वक्त के साथ आज इस होली में भी काफी बदलाव देखे जा रहे है। भले ही हमारी परंपरायें और सांस्कृतिक विरासत आधुनिकता की चकाचैंध में धुंधले पड़ते जा रहे हों, मगर कुमाऊंनी बैठकी होली की संगीतमय पंरपरा अब तक बरकरार है। जरूरत है नई पीढ़ी को इससे जोड़ने की। रामपुर घराने के लोगों जब चंद राजाओं के वहां अल्मोड़ा पहुंचे तो वहीं से इस होली का उदय माना जाता है। – हरीश पंत, शास्त्रीय संगीत शिक्षक

संबंधित समाचार