दाखिले की दौड़ और बढ़ती फीस का बोझ

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
On

cats
धनीश शर्मा, लेखक

 

बारहवीं का रिजल्ट आते ही कॉलेजों में दाखिले की दौड़ शुरू हो जाती है। कोई छात्र इंजीनियर बनने का सपना लेकर आगे बढ़ता है, कोई डॉक्टर बनने की तैयारी में जुट जाता है, तो कोई चार्टेड अकाउंटेंट या यूपीएससी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बड़े शहरों का रुख करता है। हर छात्र अपने भविष्य को बेहतर बनाने की उम्मीद के साथ नए सफर की शुरुआत करता है। बच्चों से ज्यादा चिंता उनके माता-पिता को होती है। आज के समय में बारहवीं के बाद लगभग हर प्रोफेशनल कोर्स की फीस लगातार बढ़ती जा रही है। 

इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और अन्य कोर्स करने में कई बार 10 से 15 लाख रुपये या उससे भी अधिक खर्च हो जाता है। मध्यम आय वाले परिवार किसी तरह अपनी बचत, कर्ज या शिक्षा ऋण के सहारे इन महंगे कोर्सों की फीस वहन कर पाते हैं। बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए कई माता-पिता अपनी जरूरतों में भी कटौती करने को मजबूर हो जाते हैं।

कोविड महामारी के बाद शिक्षा क्षेत्र में डिजिटल माध्यमों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। ऑनलाइन क्लास और तकनीकी संसाधनों की जरूरत ने भी अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डाला। मोबाइल फोन, लैपटॉप और इंटरनेट जैसी सुविधाएं अब पढ़ाई का हिस्सा बन चुकी हैं। ग्रामीण और छोटे शहरों में रहने वाले कई परिवारों के लिए इन सुविधाओं का खर्च उठाना मुश्किल साबित हुआ। इससे शिक्षा में असमानता भी बढ़ी है।

इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और अन्य तकनीकी पाठ्यक्रमों की फीस लाखों रुपये तक पहुंच चुकी है। कई छात्र शिक्षा ऋण लेकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी मिलने तक कर्ज का दबाव युवाओं को मानसिक तनाव में डाल देता है। कई बार आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण प्रतिभाशाली छात्र अपनी पसंद का कोर्स भी नहीं कर पाते।

शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण को इस समस्या का प्रमुख कारण माना जा रहा है। आज कई निजी संस्थान शिक्षा को सेवा नहीं, बल्कि कमाई का माध्यम मानने लगे हैं। बड़े-बड़े भवन, एयर कंडीशन क्लासरूम और आधुनिक सुविधाओं का प्रचार कर अभिभावकों को आकर्षित किया जाता है, हालांकि बेहतर सुविधाएं जरूरी हैं, लेकिन इनके नाम पर अत्यधिक फीस वसूली आम परिवारों के लिए परेशानी पैदा कर रही है। कई अभिभावकों का मानना है कि शिक्षा अब धीरे-धीरे केवल संपन्न वर्ग तक सीमित होती जा रही है।

महंगी शिक्षा का असर केवल आर्थिक स्थिति पर ही नहीं पड़ता, बल्कि इसका मानसिक प्रभाव भी दिखाई देता है। माता-पिता बच्चों की पढ़ाई के खर्च को लेकर लगातार तनाव में रहते हैं। कई लोग अतिरिक्त नौकरी या ओवरटाइम करने को मजबूर हो जाते हैं। दूसरी ओर छात्र भी परिवार की आर्थिक स्थिति को समझते हुए दबाव महसूस करते हैं। इससे पढ़ाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए तो निजी संस्थानों पर निर्भरता कम हो सकती है। अच्छी शिक्षा केवल महंगे संस्थानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सरकार द्वारा फीस नियंत्रण, छात्रवृत्ति योजनाओं और गरीब तथा मध्यम वर्ग के छात्रों को आर्थिक सहायता देने जैसे कदमों को और प्रभावी बनाने की जरूरत है। साथ ही शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता भी जरूरी है, ताकि अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े। यदि शिक्षा लगातार महंगी होती गई तो समाज का एक बड़ा वर्ग इससे प्रभावित होगा। देश की प्रगति तभी संभव है जब हर बच्चे को उसकी आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर समान अवसर मिलें। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

संबंधित समाचार