संपादकीय: समझौतों की सार्थकता

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Published By Monis Khan
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भारत और नीदरलैंड के बीच हुए समझौते बदलती वैश्विक अर्थ-राजनीति के बीच भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक पुनर्स्थापना का संकेत और देश की वैश्विक आर्थिक तथा सामरिक स्थिति को मजबूत करने की व्यापक रणनीति है। इन समझौतों की रणनीतिक विशेषता ‘भरोसेमंद साझेदारियों’ के निर्माण में निहित है। आज दुनिया ‘फ्रेंड-शोरिंग’ और ‘डी-रिस्किंग’ की नीति की ओर बढ़ रही है, जहां देश चीन-केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। 

नीदरलैंड इस परिवर्तन में यूरोप का महत्वपूर्ण तकनीकी और लॉजिस्टिक केंद्र है, जबकि भारत एक उभरती विनिर्माण शक्ति। दोनों का यह मेल स्वाभाविक और दूरदर्शी है। यदि तकनीकी सहयोग, मशीनरी आपूर्ति और कौशल हस्तांतरण प्रभावी रूप से आगे बढ़ते हैं, तो भारत केवल असेंबली केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति शृंखला का रणनीतिक भाग बन सकता है। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, रोजगार और निर्यात तीनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। 

ग्रीन हाइड्रोजन और हरित ऊर्जा पर संयुक्त रोडमैप महत्वपूर्ण है। यूरोप ऊर्जा संकट और कार्बन-न्यूट्रल अर्थव्यवस्था की चुनौती से जूझ रहा है, जबकि भारत तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग का सामना कर रहा है। ऐसे में हरित हाइड्रोजन, पवन ऊर्जा और स्वच्छ प्रौद्योगिकी में सहयोग भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा दे सकता है। रक्षा उपकरणों और तकनीक के संयुक्त निर्माण, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और जॉइंट वेंचर मॉडल पर सहमति भारत की ‘आत्मनिर्भर रक्षा’ नीति को गति दे सकती है। यह सहयोग सफल होता है तो भारत रक्षा आयातक से धीरे-धीरे रक्षा विनिर्माता और निर्यातक बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। 

विनिर्माण विस्तार की धीमी गति और वैश्विक मंदी के दबाव से गुजरते भारत को डच निवेश और तकनीकी सहयोग औद्योगिक उत्पादन क्षमता को बढ़ा सकते हैं। विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह, खाद्य प्रसंस्करण और स्मार्ट विनिर्माण क्षेत्रों में इसका प्रभाव दिखाई देगा। यूरोप का सबसे बड़े बंदरगाह का भारतीय निर्यातकों के लिए यूरोपीय बाजार में प्रवेश का रणनीतिक द्वार बनने से रॉटरडैम के माध्यम से भारतीय उत्पादों की यूरोप तक पहुंच तेज और सस्ती हो सकती है। संयुक्त व्यापार एवं निवेश समिति तथा त्वरित समाधान तंत्र निवेशकों के भरोसे को मजबूत करेंगे और संभावित भारत-यूरोप मुक्त व्यापार समझौते के लिए आधार तैयार करेंगे। 

माइग्रेशन और मोबिलिटी समझौते से भारतीय छात्रों, शोधकर्ताओं और कुशल पेशेवरों के लिए नीदरलैंड में शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। यूरोप वृद्ध होती आबादी और कौशल संकट का सामना कर रहा है, जबकि भारत युवा प्रतिभा का विशाल स्रोत है। यह समझौता दोनों देशों के लिए लाभकारी संतुलन पैदा करेगा। इंडो-पैसिफिक को लेकर साझा दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण है। नीदरलैंड अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका चाहता है। भारत और नीदरलैंड का सहयोग समुद्री सुरक्षा, मुक्त व्यापार मार्गों और नियम-आधारित व्यवस्था के समर्थन में है। अप्रत्यक्ष रूप से यह चीन की बढ़ती आक्रामकता और समुद्री विस्तारवाद के प्रति संतुलनकारी संदेश है। 

यदि भारत अपने चौथे सबसे बड़े निवेशक के साथ हुए इन समझौतों को प्रभावी क्रियान्वयन, संस्थागत सुधार और घरेलू विनिर्माण क्षमता से जोड़ सके, तो यह साझेदारी केवल निवेश तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भारत को तकनीकी, आर्थिक और भू-राजनीतिक शक्ति के रूप में उभारने में सहायक सिद्ध हो सकती है।