लोकायन : बिदेसिया, बिहार की लोकसंस्कृति और सामाजिक चेतना का लोकनाट्य

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Published By Anjali Singh
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बिहार की सांस्कृतिक विरासत लोकगीतों, लोकनृत्यों और लोकनाट्यों से समृद्ध रही है। इन्हीं लोककलाओं में ‘बिदेसिया’ एक अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली लोकनाट्य शैली है, जिसने अपनी अलग पहचान बनाई है। बिदेसिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं और मानवीय भावनाओं को मंच पर जीवंत करने वाली कला है। इसकी शुरुआत भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में हुई और इसे प्रसिद्ध लोक कलाकार एवं साहित्यकार भिखारी ठाकुर ने लोकप्रिय बनाया। उन्हंा भोजपुरी का शेक्सपीयर भी कहा जाता है।

अन्य लोकनृत्यों और लोकनाट्यों की तुलना में बिदेसिया अपेक्षाकृत नई कला मानी जाती है। इसकी उत्पत्ति 20 वीं शताब्दी में हुई, उस दौर में जब ग्रामीण समाज में रंगमंच और नाटकों के प्रति जागरूकता बहुत कम थी। भिखारी ठाकुर ने समाज की पीड़ा, गरीबी, पलायन और महिलाओं की स्थिति को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उन्होंने ‘बिदेसिया’ नामक नाटक लिखा, जिसे ‘बहारा बहार’ के नाम से भी जाना जाता है। इस नाटक में संगीत, संवाद, अभिनय और नृत्य का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है, इसलिए इसे संगीतमय लोकनाट्य भी कहा जाता है। भिखारी ठाकुर पेशे से नाई थे, लेकिन कला और समाज सुधार के प्रति उनका समर्पण उन्हें एक नई दिशा में ले गया। उन्होंने अपने जीवन की कठिनाइयों के बावजूद रंगमंच को अपनाया और लोकभाषा भोजपुरी के माध्यम से समाज को जागरूक करने का प्रयास किया। उनके नाटकों में आम लोगों की जिंदगी, उनकी परेशानियां और भावनाएं साफ तौर पर दिखाई देती हैं।

बिदेसिया की प्रस्तुतियों की एक खास विशेषता यह भी रही कि कई बार मंच पर केवल पुरुष कलाकार ही अभिनय करते थे। वे पुरुष और महिला दोनों पात्रों की भूमिका निभाते थे। महिला पात्रों को दर्शाने के लिए कलाकार साड़ी पहनते और लंबे कृत्रिम बालों का प्रयोग करते थे। यह शैली दर्शकों को आकर्षित करने के साथ-साथ लोकनाट्य की परंपरा को भी जीवंत बनाए रखती थी। बिदेसिया नाटक मुख्य रूप से उन सामाजिक मुद्दों को सामने लाता है, जिन पर उस समय खुलकर चर्चा नहीं होती थी। इसमें गरीबी, मजदूरों का पलायन, महिलाओं की उपेक्षा, घरेलू शोषण और सामाजिक असमानता जैसे विषयों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। 

जब गांवों के पुरुष रोजगार की तलाश में शहरों की ओर चले जाते थे, तब उनके पीछे छूट जाने वाली महिलाओं की पीड़ा और अकेलेपन को बिदेसिया में बेहद मार्मिक रूप से दिखाया गया। कई बार पुरुष दूसरी स्त्रियों के संपर्क में आ जाते थे और इसका सबसे अधिक असर उनकी पत्नियों पर पड़ता था। इन सामाजिक सच्चाइयों को व्यंग्य और कटाक्ष के माध्यम से प्रस्तुत करना बिदेसिया की सबसे बड़ी ताकत बनी। आज भी बिदेसिया लोकनाट्य लोगों के दिलों में अपनी विशेष जगह बनाए हुए है। यह केवल बिहार की सांस्कृतिक पहचान नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली एक जीवंत कला परंपरा है। बिदेसिया हमें यह संदेश देता है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का एक प्रभावशाली माध्यम भी हो सकती है।