सामयिकी : हर दिन औसतन 60 से अधिक प्रसूता की मौत
मातृ मृत्यु दर : प्रगति उल्लेखनीय, पर बेहतरी की संभावना
कई राज्यों, खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में, मां बनना अब भी जोखिम भरा है। किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान उसके अस्पतालों की चमक नहीं, बल्कि प्रसव कक्ष से सुरक्षित बाहर आती माताओं की मुस्कान होती है।
मां बनना हर नारी का सपना होता है। यह सृष्टि का सबसे खूबसूरत अहसास है। माना जाता है कि मां बनने के बाद ही एक नारी संपूर्ण होती है। यही वजह है कि प्रसव से पहले, प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद मां की सुरक्षा दुनिया भर में स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में रही है। इस दिशा में भारत ने भी पिछले कुछ दशकों में उल्लेखनीय प्रगति की है।
इसके बावजूद कई राज्यों, खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में, मां बनना अब भी जोखिम भरा है। किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान उसके अस्पतालों की चमक नहीं, बल्कि प्रसव कक्ष से सुरक्षित बाहर आती माताओं की मुस्कान होती है। शहरों में स्थिति पहले से बेहतर हुई है, लेकिन सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
किसी महिला की गर्भावस्था, प्रसव या प्रसव के 42 दिनों के भीतर होने वाली मृत्यु को ‘मातृ मृत्यु’ कहा जाता है। इसे मापने के लिए ‘मातृ मृत्यु अनुपात’ का उपयोग किया जाता है। इसके अनुसार, प्रति एक लाख जीवित जन्म पर जितनी महिलाओं की मृत्यु होती है, वही मातृ मृत्यु दर कहलाती है। भारत में हर वर्ष प्रसव या उससे जुड़ी जटिलताओं के कारण करीब 22 हजार महिलाओं की मौत हो जाती है। यानी औसतन हर दिन 60 से अधिक महिलाओं की जान चली जाती है।
राज्यों की स्थिति देखें तो केरल जैसे राज्य मां बनने को लगभग सुरक्षित बना चुके हैं, जबकि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह अब भी जोखिम भरा माना जाता है। भारत ने पिछले तीन दशकों में मातृ मृत्यु दर कम करने में बड़ी सफलता हासिल की है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-16 के दौरान मातृ मृत्यु दर प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 130 थी, जो 2021-23 के दौरान घटकर 88 रह गई। लगभग 62 प्रतिशत की यह कमी अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। फिलहाल राष्ट्रीय औसत इसी के आसपास स्थिर है।
मातृ मृत्यु दर कम करने में केरल देश में सबसे आगे है। वहां यह दर 18 से 30 के बीच है। महाराष्ट्र में 36, आंध्र प्रदेश में 30 से 47, तमिलनाडु में 35 से 38 और तेलंगाना में लगभग 50 है। ये राज्य अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने वालों में शामिल हैं। वहीं सबसे खराब स्थिति वाले राज्यों में मध्य प्रदेश का मातृ मृत्यु अनुपात 142 से 159, छत्तीसगढ़ का 141 से 146, उत्तर प्रदेश का लगभग 141, असम का 110 से 125 और ओडिशा का करीब 153 है।
वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉक्टर तृप्ति दुबे के अनुसार भारत में मातृ मृत्यु के सबसे बड़े कारण प्रत्यक्ष प्रसव संबंधी जटिलताएं हैं। इनमें प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव सबसे बड़ी वजह है। करीब 25 से 47 प्रतिशत मौतें इसी कारण होती हैं। इसके अलावा उच्च रक्तचाप, संक्रमण, गंभीर रक्ताल्पता, कम उम्र में गर्भधारण और असुरक्षित गर्भपात भी प्रमुख कारण हैं।
समग्र रूप से देखें तो मातृ मृत्यु दर के मामले में भारत अब वैश्विक औसत से बेहतर स्थिति में पहुंच चुका है। वर्ष 2023 में दुनिया भर में हुई मातृ मौतों में भारत की हिस्सेदारी लगभग सात प्रतिशत रही। यह तब है, जब दुनिया में प्रजनन योग्य आयु की सबसे बड़ी आबादी भारत में है। केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों का मॉडल अपनाकर इस क्षेत्र में अभी और बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
