शिक्षण संस्थानों में सुनिश्चित हो नैतिकता

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Published By Anjali Singh
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शिक्षा एक ऐसा आभूषण है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व को उत्कृष्ट चारित्रिक आयामों तक पहुंचाता है। यदि यह कहा जाए कि नैतिकता एवं चरित्र की सरिता का उद्गम शिक्षालय ही होता है, तो इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है। किंतु हाल की खबरें इस अटूट सत्य एवं विश्वास पर एक कठोर आघात करती हुई प्रतीत होती हैं। हाल ही में लखनऊ विश्वविद्यालय के जूलॉजी विभाग के एक शिक्षक के द्वारा परीक्षा के प्रश्नपत्र आउट करने के बदले में एक छात्रा पर व्यक्तिगत रूप से मिलने हेतु दबाव बनाने का मामला प्रकाश में आया है। ऐसा कोई एक ही मामला नहीं है, अपितु अनेक ऐसे मामले प्रकाश में आकर गुरु शिष्य संबंध की पवित्रता को कलंकित करते रहते हैं। 

कुछ दिन पूर्व मध्य प्रदेश के रीवा से भी एक ऐसी ही घटना प्रकाश में आई थी, जिसमें शिक्षक के द्वारा छात्रा को अश्लील एवं धमकाने वाले संदेश भेजे गए थे। इसी तरह का एक मामला कुछ माह पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय से भी सामने आया था, जिसमें छात्रा ने प्रोफेसर पर उत्पीड़न एवं धमकी देने का आरोप लगाया था। विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय वस्तुतः समाज के ऐसे केंद्र होते हैं, जहां युवा पीढ़ी अपने व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और संस्कारों को आकार एवं दिशा देती है। 

शिक्षक को हमारी भारतीय परंपरा में ईश्वर के समतुल्य माना गया है, क्योंकि वह एक अध्यापक के साथ-साथ पथप्रदर्शक की भूमिका का भी निर्वहन करता है। जरा कल्पना कीजिए कि जब वही शिक्षक अपने पद, प्रभाव और अधिकार का दुरुपयोग करने लगेगा, तो शैक्षिक परिदृश्य किस स्तर तक विषाक्त होगा। एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि कतिपय चरित्रहीनों की शर्मनाक गतिविधियों की वजह से सम्पूर्ण शिक्षा जगत को समाज के उपेक्षित दृष्टिकोण का शिकार होने पर विवश होना पड़ता है। 

परीक्षा एवं अंको का लालच देकर विद्यार्थियों, बल्कि विशेषतः छात्राओं से अभद्रतापूर्ण व्यवहार निश्चित रूप से संबंधित शिक्षक के पतित चरित्र एवं निम्न मानसिक स्तर का परिचायक है। ये घटनाएं कहीं न कहीं इस बात को इंगित करती हैं कि आज गुरु शिष्य संबंध विश्वास, सम्मान एवं पवित्रता के आवरण से बाहर निकलकर भय, असुरक्षा एवं संदेह के घेरे में प्रविष्ट हो चुका है। कहीं न कहीं इसके पीछे संस्थागत विफलता दृष्टिगोचर होती है।

प्रायः विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में आंतरिक शिकायत समितियां तो गठित हो जाती हैं, किंतु अधिकांश मामलों में उनकी सक्रियता केवल कागजों तक सीमित रहती है। छात्राएं अक्सर शिकायत दर्ज कराने से डरती हैं, क्योंकि उन्हें बदनामी, प्रताड़ना या शैक्षणिक क्षति का भय सताता है। कई बार आरोपी शिक्षक का प्रभाव इतना अधिक होता है कि पीड़ित पक्ष स्वयं को असहाय महसूस करता है, नतीजतन अनेक घटनाएं सामने आने से पहले ही दबा दी जाती हैं।

आज शिक्षण संस्थानों का परिवेश भी शनैः शनैः नैतिक केंद्रों की अपेक्षा प्रतिस्पर्धी और व्यावसायिक ढांचों में बदलते जा रहे हैं। शिक्षक और छात्र के बीच संवाद का स्वरूप भी परिवर्तित हुआ है। डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया ने संपर्क को निस्संदेह आसान बनाया है, किंतु शिक्षक व शिक्षार्थी के मध्य की सीमारेखा को धुंधला कर दिया है। इन घटनाओं का सबसे गंभीर प्रभाव छात्राओं की मनःस्थिति पर पड़ता है। उनकी दृष्टि में शिक्षण संस्थान असुरक्षा एवं भय का प्रतीक बन जाते हैं, परिणामतः उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है और कई बार वे अवसाद, तनाव तथा आत्मग्लानि जैसी स्थितियों का सामना करती हैं। व्यक्तित्व एवं चरित्र को गढ़ने के लिए मन का स्वच्छंद एवं निर्भीक होना अनिवार्य है। किंतु शिक्षक का चरित्र ही जब परिवेश को दूषित करने लगेगा, तब विद्यार्थी स्वयं को असहाय एवं असहज महसूस करेगा। 

आवश्यकता है इस माहौल को बदलने की ताकि शैक्षिक उन्नयन की प्रक्रिया निर्बाध रूप से गतिमान रह सके। शिक्षकों का भी सतत शैक्षिक एवं चारित्रिक मूल्यांकन पूर्ण निष्पक्षता एवं पारदर्शिता के साथ किया जाना चाहिए ताकि वे अपने विषय के साथ निरंतर गतिमान रह सकें। एक शिक्षक अपने विद्यार्थी के लिए आदर्श होता है, अतः उसका चारित्रिक उज्ज्वलता, मानवीय संवेदनाओं, अनुशासन एवं नैतिक संतुलन से ओतप्रोत होना अनिवार्य है ताकि वह राष्ट्र के लिए गुणवत्तापूर्ण भविष्य का निर्माण कर सके। विद्यार्थियों का अपने अधिकारों और सुरक्षा के प्रति जागरूक होना भी नितांत आवश्यक है। 

अक्सर सामाजिक दबाव अथवा करियर खराब हो जाने का भय छात्राओं की आवाज को दबा देता है। शिक्षण संस्थानों को ऐसा वातावरण देना होगा, जहां पीड़ित अथवा पीड़िता बिना भय के शिकायत कर सके और साथ ही उसे न्याय मिलने का भी पूर्ण भरोसा हो। समाज और अभिभावकों की सहयोगात्मक भूमिका भी यहां पर बेहद अहम है। यह भी आवश्यक है कि हम पूरे शिक्षक समुदाय पर संदेह का दृष्टिपात न करें। आज भी अनेक शिक्षक अत्यंत ईमानदारी और समर्पण से अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। वे विद्यार्थियों के जीवन को सकारात्मक दिशा दे रहे हैं और समाज को बेहतर बना रहे हैं। 

 

-शिशिर शुक्ला

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