रिश्तों का कड़वा सच : दो-दो सरकारी नौकर बेटे, फिर भी बूढ़ी मां के लिए घर के किसी कोने में जगह नहीं

Amrit Vichar Network
Published By Pradeep Kumar
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भरा-पूरा परिवार होकर भी सावित्री आंटी 12 बरस से समय बिताने को मजबूर, अपनों ने मुंह फेरा, बेगाने दे रहे सहारा

आसिफ अंसारी बरेली, अमृत विचार। ढलती उम्र अपनों का सहारा चाहती है मगर बुजुर्गों को बोझ समझकर अपने बेगाने बन जाएं तो वेदना के एहसास बयां नहीं किए जा सकते। बेटा अमेरिका में था और नरेन्द्र बाबा बरेली वृद्धाश्रम में। अपनों क इंतजार में बुजुर्ग आंखें पथरा गईं और एक दिन सांसं भी थम गईं। ऐसे ही उत्तराखंड की रहने वालीं सावित्री आंटी के दो-दो बेटे सरकारी नौकर हैं। भरे-पूरे परिवार यदि कुछ नहीं है तो वो मां के रहने को जगह। 12 बरस से वृद्धाश्रम में समय गुजार रही हैं। लालफाटक के पास स्थित ओल्ड एज होम में 132 बुजुर्ग है और सबकी अपनी अलग व्यथाए हैं।

बताया गया है कि नरेन्द्र बाबा मेरठ के थे,जो इसी वृद्धाश्रम में दुनिया को अलविदा कह गए। सावित्री देवी पोंडी गढ़वाल की हैं और 75 पार की उम्र में बहुत कमजोर हो चली हैं और रिश्तों के बिखरे संसार को अपनी आंखों से देख रही हैं। बच्चे जब छोटे थे, पति तभी चल बसे। दो बेटे और एक बेटी के पोषण और पढ़ाई में मां ने कितना संघर्ष किया, वहीं जानती हैं। बेटों की सरकारी जॉब लग गई और बेटी के हाथ पीले कर दिए। बहुओं को सास बोझ लगने लगी। घर में प्रताड़ना के सिलसिले शुरू हुए और दूर कहीं नौकरी करने वाले बेटे मौन होकर बैठ गए। बूढ़ी मां क्या करती, 2014 में घर छोड़ दिया और वृद्धा आश्रम आ गईं। बताती हैं बेटों ने आज तक सुध नहीं है। बेटी जरूर आकर दुख-दर्द बांट लेती है।

पुष्पा की पीड़ा..बच्चे नहीं हुए तो पति ने मुंह मोड़ा
बिसौली की पुष्पा देवी(60) दस महीने से वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। बताती हैं कि प्लांट चलाने वाले पति ने बच्चे न होने पर उनसे मुंह फेरकर दूसरी शादी कर ली थी। उनके जेवर बेचकर ठुकरा दिया। वह दर-दर ठोकरें खाती रहीं। रिश्तेदार-परिवार कोई काम नहीं आया। 10 बरस इधर-उधर गुजारा किया। मुंहबोली ननद ने 10 माह पहले वृद्धाश्रम में पहुंचा दिया। जब यही उनका परिवार है।

चाय के भी लाले पड़े तो राजकुमारी ने घर छोड़ा
बरेली शहर की रहने वाली राजकुमारी देवी(65) 11 अप्रैल को वृद्धा आश्रम में आई थीं। बताया कि एक बेटा सरकारी कर्मचारी और दूसरा व्यापारी होने के बाद भी उनका घर में ख्याल नहीं रखा जा रहा था। बेटी की शादी कर दी थी। बहु को वह पसंद नहीं थीं। चाय के भी लाले पड़ रहे थे। उनके साथ मारपीट की जाती थी। कब तक बर्दाश्त करतीं, दो महीना पहले घर से अपने कपड़े लेकर निकल आईं और वृद्धाश्रम पहुंच गईं। अब तक किसी अपने ने नहीं उनकी खबर ली है।

नए संसार में खुशियां अपार, राहत में सभी बुजुर्ग
समाज कल्याण विभाग की ओर से संचालित लाल फाटक वृद्धाश्रम की क्षमता 150 की है मगर अभी 132 बुजुर्ग रह रहे हैं। इनमें 62 महिलाएं और 70 पुरुष हैं। सबके रहने-खाने का अच्छा ख्याल रखा जा रहा है। विभाग तो व्यवस्थाएं करता ही है, समय-समय पर सामाजिक संगठन एवं समाजसेवी भी जरूरी चीजें लेकर पहुंचते रहते हैं। वृद्धाश्रम में सबकी तय दिनचर्या रहती है। सभी बुजुर्ग रोज सुबह पांच बजे जागते हैं। नित्यकर्म के बाद योग और प्रार्थना कराई जाती है। 6 से लेकर 7 बजे तक स्नान और साफ सफाई होती है। 7 से 8: 30 बजे तक सुबह का नाश्ता, 8: 30 से 9: 30 बजे तक अखबार पढ़ना होता है। इसके बाद सभी टीवी पर कार्यक्रम देखते हैं। धार्मिक व मनोरंजक पुस्तकें पढ़ते हैं। 11: 30 से लेकर 12: 15 बजे तक दोपहर के भोजन का समय है। इसके बाद दोपहर में पर्याप्त आराम और 3: 30 से लेकर 5 बजे तक संध्या भजन और सतसंग का दौर चलता है। फिर नाश्ता, टीवी और आरती, भोजना और शयन..। अपनों से दूर होकर भी बुजुर्गोँ के संसार में खुशियां बेशुमार दिखती हैं। हालांकि, बुजुर्ग निगाहों में अपनों के बेगाने बर्ताव की पीड़ा भी नजर आती है।

वृद्धाश्रम में रहने वाले सभी बुजुर्गों को बेहतर सुविधाएं दी जा रही है। रहने, भोजन, स्वास्थ्य और अन्य तरह की जरूरी व्यवस्थाओं नियमित ध्यान रखा जा रहा है। -कांता गंगवार, प्रबंधक।

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