बोध कथा : स्वयं को तराशना
एक दिन उनका एक युवा शिष्य कीर्ति, जिससे सोमदेव बहुत स्नेह करते थे, अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाया। उसने हाथ जोड़कर प्रार्थना की- “गुरुदेव! मैंने वर्षों आपसे मूर्तिकला सीखी है। मुझे धन का लोभ नहीं है, पर मेरी आत्मा यह जानने के लिए व्याकुल है कि आपकी सर्वश्रेष्ठ कृतियां, जिन्हें दुनिया कभी देख नहीं पाती, वो दिखती कैसी हैं? कृपया मुझे एक बार उस तहखाने में ले चलें।” सोमदेव ने मुस्कुराते हुए उसकी ओर देखा और कहा- “ठीक है, आज रात तुम्हारी यह इच्छा पूरी होगी।”
रात के सन्नाटे में सोमदेव अपने शिष्य को लेकर तहखाने में उतरे। दीपक की मद्धम रोशनी में कीर्ति ने जो देखा, उसने उसके होश उड़ा दिए। वहां कतार से पांच मूर्तियां रखी थीं, लेकिन वे मूर्तियां किसी देवी-देवता, राजा या अप्सरा की नहीं थीं।
पहली मूर्ति एक अत्यंत क्रूर, भयानक चेहरे वाले डाकू की थी, जिसकी आंखों में हिंसक चमक थी। वहीं दूसरी मूर्ति एक ऐसे व्यक्ति की थी, जो ईर्ष्या और जलन की आग में झुलस रहा था, उसके चेहरे पर विकृति थी। तीसरी मूर्ति एक लालची व्यापारी की थी, जो अपनी मुट्ठी में कुछ सिक्के भींचे हुए था और उसके चेहरे पर भय था। चौथी मूर्ति एक अहंकारी राजा की थी, जिसका सिर घमंड से तना हुआ था। कीर्ति हैरान रह गया। उसने डरते-डरते पूछा, “गुरुदेव! आप इतने महान कलाकार हैं। आप चाहें, तो सौंदर्य और दिव्यता की प्रतिमूर्तियां बना सकते हैं। फिर आपने अपने जीवन के बहुमूल्य व र्ष इन कुरूप, पापी और विकृत इंसानों की मूर्तियां बनाने में क्यों नष्ट कर दिए?” सोमदेव शांत रहे। उन्होंने आखिरी मूर्ति पर से कपड़ा हटाया। वह मूर्ति हूबहू सोमदेव की अपनी थी, जिसमें उनका चेहरा अत्यंत शांत, सौम्य और ध्यानमग्न दिखाई दे रहा था।
सोमदेव ने कीर्ति के कंधे पर हाथ रखा और कहा- “पुत्र! लोग सोचते हैं कि मूर्तिकार केवल बाहर के पत्थरों को तराशता है, लेकिन वास्तव में, कला मेरे लिए स्वयं को तराशने का माध्यम है। जब मेरे भीतर किसी के प्रति क्रोध या हिंसा का विचार आया, तो मैंने उस क्रोध को अपने भीतर दबाने के बजाय पत्थर पर उतार दिया और वह डाकू बन गया। जब मुझे किसी की सफलता देखकर क्षणिक ईर्ष्या हुई, मैंने उसे पत्थर में ढाल दिया और वह विकृत चेहरा बन गया। जब मेरे भीतर संसार का लोभ जागा, तो मैंने उस लोभ को बाहर निकालकर लालची व्यापारी की मूर्ति बना दी और जब मुझे अपनी कला पर थोड़ा भी घमंड हुआ, तो मैंने उस अहंकार को घमंडी राजा के रूप में तराश कर खुद से अलग कर दिया।”
सोमदेव ने अपनी खुद की शांत मूर्ति की तरफ इशारा करते हुए कहा- “इन सारी कमियों और विकारों को एक-एक करके अपने भीतर से निकालकर पत्थर में डाल देने के बाद, जो अंत में मेरे भीतर बचा, वह यह शांत स्वरूप है। यह तहखाना मेरी कला का संग्रह नहीं, मेरे भीतर के कचरे का कब्रिस्तान है।”
कथा की सीख है कि हम अक्सर अपनी कमियों, अपने क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार को छुपाने की कोशिश करते हैं या उन्हें दूसरों में ढूंढते हैं। सच्ची शिक्षा और आत्मसुधार यह है कि हम अपने भीतर के विकारों को पहचानें, उन्हें स्वीकार करें और उन्हें अपने व्यक्तित्व से इस तरह तराश कर बाहर निकाल दें कि अंत में केवल हमारी आत्मा का शुद्ध और शांत स्वरूप ही शेष बचे। दूसरों को सुधारने से पहले स्वयं को तराशना ही जीवन की सबसे बड़ी शिल्पकला है।
