UP News : योगी सरकार का वेटलैंड मिशन तेज, 101 आर्द्रभूमियां अधिसूचित, 44 नई साइटों का प्रस्ताव

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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लखनऊ, अमृत विचार: प्रदेश में आर्द्रभूमियों (वेटलैंड) के संरक्षण और प्रबंधन की प्रक्रिया तेज हो गई है। राज्य सरकार ने वेटलैंड (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम-2017 के तहत प्रदेशभर में आर्द्रभूमियों की पहचान, सीमांकन और अधिसूचना अभियान को गति दी है। अब तक प्रदेश के 26 जिलों की 101 आर्द्रभूमियों को अधिसूचित किया जा चुका है, जबकि 36 जिलों से 44 नई आर्द्रभूमियों को अधिसूचित करने के प्रस्ताव सरकार को प्राप्त हुए हैं।

मुख्य सचिव के समक्ष हुए प्रस्तुतीकरण के अनुसार अधिसूचित आर्द्रभूमियों का कुल क्षेत्रफल लगभग 2,750 हेक्टेयर है। इनमें कानपुर नगर, गोरखपुर, बाराबंकी, महाराजगंज, प्रयागराज, आगरा, सहारनपुर, कुशीनगर, उन्नाव सहित कई जिलों की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियां शामिल हैं। सरकार का लक्ष्य इन प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण कर जल सुरक्षा, जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन को मजबूत करना है।

सरकार का कहना है कि आर्द्रभूमियां केवल तालाब या झील नहीं, बल्कि प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये भूजल स्तर बनाए रखने, पेयजल उपलब्ध कराने, सिंचाई में सहयोग, बाढ़ और सूखे के प्रभाव को कम करने, मत्स्य पालन को बढ़ावा देने तथा पक्षियों एवं अन्य वन्य जीवों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाती हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में भी इनका विशेष योगदान माना जाता है।

अतिक्रमण रोकने के लिए वैज्ञानिक सीमांकन

योगी सरकार ने आर्द्रभूमियों को अतिक्रमण से बचाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से सीमांकन कराने पर विशेष जोर दिया है। इसी क्रम में प्रदेश के सभी 75 जिलों में 14,562 स्थानों पर सीमा निर्धारण का कार्य पूरा किया जा चुका है। सरकार का मानना है कि स्पष्ट सीमांकन से संरक्षण कार्य अधिक प्रभावी होगा और प्राकृतिक जल स्रोतों को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकेगा।

रामसर साइट के लिए बढ़ाए जा रहे कदम

राज्य सरकार उत्तर प्रदेश की प्रमुख आर्द्रभूमियों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में भी काम कर रही है। इसके लिए रामसर साइट के मानकों के अनुरूप आवश्यक दस्तावेज, मानचित्र, फोटोग्राफ और तकनीकी विवरण तैयार किए जा रहे हैं। सरकार का प्रयास है कि प्रदेश की अधिक से अधिक आर्द्रभूमियों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिले और उनके संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी प्राप्त हो सके।

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