Europe Heatwave : यूरोप में टूटते तापमान के रिकॉर्ड्स के पीछे का खौफनाक सच, वैज्ञानिकों ने बताया क्यों गंभीर है यह संकट
मेलबर्न / पेरिस। यूरोप में चिलचिलाती धूप और अभूतपूर्व गर्मी के कारण तापमान के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो रहे हैं और पूरा महाद्वीप इस समय भीषण 'हीटवेव' (भीषण गर्मी) की चपेट में है। फ्रांस और ब्रिटेन में इतिहास के सबसे गर्म दिन दर्ज किए जा रहे हैं। फ्रांस के पश्चिमी हिस्सों में अधिकतम तापमान 39 से 43 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच गया है, वहीं ब्रिटेन में जून का तापमान 36.1 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया। स्पेन, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड भी भीषण तपन से सुलग रहे हैं। इस जानलेवा गर्मी के कारण फ्रांस में राहत पाने की कोशिश में डूबने से दर्जनों लोगों की मौत भी हो चुकी है।
इसके साथ ही समुद्र की सतह का वैश्विक तापमान भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। ऑस्ट्रेलिया के मौसम विभाग ने आधिकारिक तौर पर 'अलनीनो' (El Niño) की स्थिति बनने की पुष्टि की है, जिससे ऑस्ट्रेलिया, एशिया, दक्षिण प्रशांत क्षेत्र सहित भारत और पाकिस्तान में भी इस वर्ष सामान्य से अधिक गर्म और शुष्क मौसम रहने के आसार हैं।
वैज्ञानिकों की बढ़ी चिंता
मौसम वैज्ञानिकों ने यूरोप की इस मौजूदा गर्मी को बेहद असामान्य और गंभीर माना है, जिसके पीछे दो मुख्य कारण हैं
इन दो कारणों ने चौंकाया
समय से बहुत पहले दस्तक
यूरोप में आमतौर पर सबसे गर्म समय जुलाई के मध्य से आखिर तक होता है। लेकिन हालिया शोध बताते हैं कि अब भीषण गर्मी जून में ही शुरू हो रही है। वर्ष 1950 के बाद यह केवल दूसरी बार है जब गर्मियों के चरम मौसम से कई हफ्ते पहले ही इतनी भीषण हीटवेव आई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान में 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। इसके चलते जो भीषण गर्मी पहले 50 साल में एक बार आती थी, वह अब हर 5 साल में देखने को मिल रही है।
प्रचंड गंभीरता और टूटते रिकॉर्ड
फ्रांस में वर्ष 1947 के बाद से सबसे गर्म दिन और रातें दर्ज की जा रही हैं। देश के 147 शहरों में जून का अब तक का सबसे अधिक तापमान रिकॉर्ड हुआ है, जबकि 41 केंद्रों पर पारा 43 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया। हालात इतने गंभीर हैं कि नदियों का पानी असामान्य रूप से गर्म होने के कारण परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में कूलिंग (शीतलन) के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सका। स्पेन में कुछ जगहों पर लगातार तीन रातों तक तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं उतरा, जबकि दिन का पारा 45 डिग्री सेल्सियस पार कर गया। अनुमान है कि यह हीटवेव अब पोलैंड और जर्मनी जैसे पूर्वी हिस्सों की तरफ बढ़ रही है।
आखिर क्यों पड़ रही है इतनी भीषण गर्मी?
स्थानीय कारण (उच्च वायुदाब): जब किसी क्षेत्र के ऊपर 'उच्च वायुदाब' (High Pressure System) का मजबूत क्षेत्र लंबे समय तक बना रहता है, तो वह एक 'वायुमंडलीय ढक्कन या परत' की तरह काम करता है। यह गर्म हवा को नीचे की सतह के पास रोक लेता है और बादलों को हटाकर सीधी धूप धरती तक पहुंचाता है, जिससे तापमान तेजी से बढ़ता है।
वैश्विक कारण (जीवाश्म ईंधन): तेल, कोयला और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से बढ़ रहा जलवायु परिवर्तन इसकी सबसे बड़ी वजह है। 1950 से 1999 के बीच यूरोप में हीटवेव के केवल 5 दौर आए थे, लेकिन साल 2000 से 2025 के बीच यह संख्या बढ़कर 20 से अधिक हो चुकी है।
मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बड़ा खतरा
'यूरोपियन क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट' के अनुसार, दक्षिणी और पश्चिम-मध्य यूरोप में अत्यधिक गर्मी जनस्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन चुकी है। आने वाले समय में गर्मी से जुड़ी बीमारियों का जोखिम और बढ़ेगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि जलवायु परिवर्तन के साथ अलनीनो का प्रभाव इसी तरह जुड़ा रहा, तो वर्ष 2026 और 2027 में वैश्विक औसत तापमान इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़ सकता है। अत्यधिक गर्मी अब किसी एक देश या महाद्वीप की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की पर्यावरण, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक बड़ा वैश्विक संकट बन चुकी है।
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