12 साल बाद बड़ा कौतूहल : रामनगर के जंगल में अचानक दिखी उड़ने वाली गिलहरी

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Published By Virendra Pandey
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विनोद पपनै, रामनगर, अमृत विचार :  उड़ती नज़र आने वाली गिलहरी  नगर एवं ग्रामीण हल्कों में चर्चा का विषय बनी रही। उत्तराखंड के कॉर्बेट से सटे रामनगर वन क्षेत्र में 12 साल बाद एक बार फिर दुर्लभ इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल दिखाई दी है। यह अनोखी रात्रिचर गिलहरी ग्रामीण के घर में देखा जाना ग्रामीणों के लिए कौतूहल का विषय बना रहा। सूचना मिलते ही बाद वन विभाग की टीम ने सफलतापूर्वक इसका रेस्क्यू किया।

रामनगर वन प्रभाग के कोसी रेंज अंतर्गत टेड़ा गांव में उस समय लोगों की भीड़ जुट गई, जब एक बड़े आकार की दुर्लभ गिलहरी एक ग्रामीण के घर में दिखाई दी। पहली नजर में यह सामान्य गिलहरी से बिल्कुल अलग लगी, जिससे ग्रामीण हैरान रह गए। सूचना मिलते ही वन विभाग के रेस्क्यू एक्सपर्ट आशीष कश्यप और राजेश कश्यप मौके पर पहुंचे और सावधानीपूर्वक इस दुर्लभ जीव का सफल रेस्क्यू किया।

इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल की हुई पुष्टि                                                                              

जांच के दौरान वन कर्मियों ने पुष्टि की कि यह इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल है, जिसे उड़ने वाली गिलहरी भी कहा जाता है,हालांकि यह पक्षियों की तरह उड़ती नहीं, बल्कि अपने आगे और पीछे के पैरों के बीच मौजूद पेटागियम नामक त्वचा की झिल्ली की मदद से एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक लगभग 60 से 80 मीटर तक हवा में ग्लाइड करती है. यही इसकी सबसे अनोखी विशेषता है ।

साल 2014 में भी देखी गई थी                        

वन विभाग के अनुसार रामनगर क्षेत्र में इस दुर्लभ प्रजाति की आखिरी रिकॉर्डिंग वर्ष 2014 में ढिकुली-गार्जिया वन क्षेत्र में हुई थी, लगभग 12 साल बाद इसका दोबारा दिखाई देना वन्यजीव संरक्षण और क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

क्या कहते है विशेषज्ञ

वन्यजीव जानकार संजय छिम्वाल बताते हैं कि इस प्रजाति को मलाबार जायंट फ्लाइंग स्क्विरल भी कहा जाता है, क्योंकि यह पश्चिमी घाट के मलाबार क्षेत्र में भी पाई जाती है। उत्तराखंड में इसके दर्शन मुख्य रूप से रानीखेत, लैंसडाउन, पिथौरागढ़, चकराता और मसूरी के घने जंगलों में होते हैं,रामनगर और कॉर्बेट की शिवालिक तलहटी में इसका दोबारा मिलना बेहद दुर्लभ और उत्साहजनक घटना है।

उप प्रभागीय वनाधिकारी अंकित बडोला ने बताया कि यह पूरी तरह रात्रिचर प्रजाति है और दिन के समय कम ही दिखाई देती है। रेस्क्यू के बाद गिलहरी का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया है और जल्द ही इसे सुरक्षित प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया जाएगा,साथ ही इस रिकॉर्ड को विभागीय दस्तावेजों में भी दर्ज किया जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस दुर्लभ गिलहरी की वापसी इस बात का संकेत है कि रामनगर के जंगल आज भी कई अनमोल और कम दिखाई देने वाले वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आवास बने हुए हैं।यह  संरक्षण प्रयासों की सफलता और प्रकृति की समृद्ध विरासत का एक प्रेरक उदाहरण है। वन्यजीव विशेषज्ञ इसे जैव विविधता के संरक्षण के लिए शुभ संकेत मान रहे है।

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