Sawan Somwar 2026: लोधेश्वर महादेवा में उमड़ा महासैलाब, जानिए क्यों हर मनोकामना पूरी करने वाले माने जाते हैं बाबा लोधेश्वर
सावन सोमवार 2026 पर बाराबंकी के लोधेश्वर महादेवा में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। जानिए बाबा लोधेश्वर का इतिहास, धार्मिक मान्यता और क्यों उन्हें हर मनोकामना पूरी करने वाले शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है।
बाराबंकी, अमृत विचार। सावन के पहले सोमवार पर उत्तर प्रदेश के बाराबंकी स्थित महाभारतकालीन पौराणिक तीर्थ श्री लोधेश्वर महादेवा धाम में आस्था का अभूतपूर्व सैलाब उमड़ पड़ा। तड़के महाआरती के बाद जैसे ही मंदिर के कपाट खुले, लाखों शिवभक्त 'हर-हर महादेव' और 'बम-बम भोले' के जयघोष के बीच भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए कतारों में लग गए। बारिश भी श्रद्धालुओं के उत्साह को नहीं रोक सकी।

गंगाजल, दूध, दही, शहद, बेलपत्र, भांग, धतूरा, कमल, अक्षत और पुष्प अर्पित कर भक्तों ने भोलेनाथ का विधिवत पूजन-अर्चन किया। मंदिर परिसर घंटे-घड़ियाल, शंखनाद और शिवभक्ति से पूरी तरह शिवमय हो उठा। कानपुर, उन्नाव, झांसी, जालौन, उरई, गोंडा, करनैलगंज, सीतापुर सहित प्रदेश के कई जिलों से पैदल और कांवड़ लेकर पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा लोधेश्वर के दर्शन कर स्वयं को धन्य बताया। भक्तों का कहना था कि इस धाम में आकर मन को अद्भुत शांति मिलती है और सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।
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मंदिर के पुजारी आदित्य महाराज बताते हैं कि श्री लोधेश्वर महादेवा धाम का इतिहास चारों युगों से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि सतयुग में भगवान वराह ने यहां शिव की आराधना की थी। त्रेतायुग में लव-कुश ने सप्तऋषि आश्रम में शिक्षा के दौरान उदर पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए यहां पूजा की थी।
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द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान धर्मराज युधिष्ठिर सहित पांडवों ने इसी क्षेत्र में निवास कर भगवान शिव का पूजन किया और यहीं दुर्लभ शिवलिंग की स्थापना की। मंदिर से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित किंतूर का कुंतेश्वर मंदिर और बरौलिया का विश्वप्रसिद्ध पारिजात वृक्ष भी इस धार्मिक परंपरा का हिस्सा माने जाते हैं। मान्यता है कि माता कुंती के यज्ञ के लिए भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन इंद्रलोक से पारिजात वृक्ष लेकर आए थे। उसी के स्वर्ण समान पुष्पों से पांडवों ने बाबा लोधेश्वर का पूजन किया था।
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कलियुग में एक ब्राह्मण परिवार के यहां रहने वाली एक वृद्ध लोधी माता प्रतिदिन एक गाय का दूध एक गड्ढे में अर्पित करती थीं, क्योंकि उन्हें वहां भगवान शिव के दर्शन होते थे। भगवान की कृपा से ब्राह्मण को पुत्र प्राप्त हुआ, जिसका नाम लोधेराम रखा गया। बड़े होने पर लोधेराम खेत की सिंचाई कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि पानी एक गड्ढे में समाता जा रहा है। रात में भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन देकर उसी स्थान पर अपना निवास होने की बात कही। अगले दिन खुदाई के दौरान फावड़ा किसी कठोर वस्तु से टकराया और पहले रक्त, फिर दूध की धारा निकली। इसे दिव्य चमत्कार मानकर खुदाई रोक दी गई।
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इसके बाद भगवान शिव ने लोधेराम को दर्शन देकर कहा कि चारों युगों में उनकी पूजा हुई है और कलियुग में वे लोधेराम के नाम से पूजे जाएंगे। तभी से 'लोधे' और 'ईश्वर' शब्द मिलकर इस पवित्र धाम का नाम लोधेश्वर पड़ा। पुजारी आदित्य महाराज के अनुसार सावन में बाबा लोधेश्वर का जलाभिषेक विशेष फलदायी माना जाता है।
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मान्यता है कि इस महीने गंगाजल, दूध और बेलपत्र से शिवलिंग का अभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही वजह है कि हजारों कांवड़िए कई सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा कर यहां जल चढ़ाने पहुंचते हैं।
सावन के पहले सोमवार को उमड़ी भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। पूरे मेला परिसर और गर्भगृह की निगरानी सीसीटीवी कैमरों से की गई। बड़ी संख्या में पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारी तैनात रहे ताकि श्रद्धालुओं को सुगमता से दर्शन और जलाभिषेक कराया जा सके। श्री लोधेश्वर महादेवा धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि इतिहास, पौराणिक मान्यताओं और अटूट आस्था का ऐसा संगम है, जहां हर सावन करोड़ों लोगों की श्रद्धा उमड़ पड़ती है। शिवभक्तों का विश्वास है कि बाबा लोधेश्वर का बुलावा जिस पर आता है, वही यहां पहुंच पाता है और सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी खाली नहीं लौटती। यही विश्वास हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को इस पावन धाम तक खींच लाता है।
हर वर्ष लगते हैं चार बड़े मेले
श्री लोधेश्वर महादेवा धाम में वर्षभर चार प्रमुख मेले आयोजित होते हैं
-सावन मास में एक महीने का विशाल मेला।
-कजरी तीज पर दो दिवसीय धार्मिक आयोजन।
-अगहन कृष्ण चतुर्दशी पर पंडित लोधेराम को भगवान शिव के दर्शन की स्मृति में सरकारी मेला महोत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रम।
-फाल्गुन मास एवं महाशिवरात्रि पर विशाल कांवड़ मेला, जिसमें लखनऊ, उरई, जालौन, कालपी, इटावा, मैनपुरी, महोबा, कानपुर, उन्नाव समेत मध्य प्रदेश की सीमा तक से श्रद्धालु गंगाजल लेकर जलाभिषेक करने आते हैं।
