लखनऊ समिट बिल्डिंग साइबर केस में बड़ा उलटफेर ! 119 गिरफ्तारियां, चार आरोपियों को जमानत और अब पुलिस की कार्रवाई पर बड़े सवाल!
लखनऊ के समिट बिल्डिंग साइबर फ्रॉड मामले में हाईकोर्ट ने चार आरोपियों को जमानत दी है। 119 लोगों की गिरफ्तारी वाले इस मामले में पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे हैं। तीन पुलिसकर्मी निलंबित और छह लाइन हाजिर किए जा चुके हैं। कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य कब्जे में होने और हिरासत की जरूरत पर्याप्त रूप से साबित न होने के पहलू पर विचार किया।
लखनऊ, अमृत विचार। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चर्चित समिट बिल्डिंग अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ से चार आरोपियों को जमानत मिलने के बाद पुलिस की कार्रवाई और विवेचना को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। राजधानी पुलिस ने इस मामले में एक साथ 119 लोगों को गिरफ्तार कर बड़े संगठित साइबर अपराध नेटवर्क का खुलासा करने का दावा किया था।
लेकिन अब इसी कार्रवाई से जुड़े मामले में पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई और आरोपियों को जमानत मिलने से जांच प्रक्रिया चर्चा में आ गई है।मामले में हैबियस कॉर्पस की सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्रवाई और गिरफ्तारियों से जुड़े कई सवाल अदालत के सामने आए। इसके बाद तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित और छह को लाइन हाजिर किया गया। इससे मामले में की गई गिरफ्तारी और विवेचना की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
119 गिरफ्तारियां, अब पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल
राजधानी पुलिस ने जिस कार्रवाई को बड़े संगठित साइबर अपराध नेटवर्क के खिलाफ बड़ी सफलता के रूप में पेश किया था, अब उसी कार्रवाई में कथित प्रक्रियात्मक चूक और अन्य आरोपों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। खास बात यह है कि गिरफ्तारी के बाद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की ओर से मीडिया में इस कार्रवाई और कथित साइबर अपराध के खुलासे को प्रमुखता से बताया गया था। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि यदि कार्रवाई में गंभीर खामियां सामने आती हैं और पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई होती है, तो उस पूरी कार्रवाई की उच्चस्तरीय जवाबदेही किसकी होगी?
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हाईकोर्ट में कानूनी दलीलों से आरोपियों को मिली राहत
19 अगस्त को हुई सुनवाई में आरोपियों की ओर से अधिवक्ता ईशान बघेल, निश्चल वर्मा, सागर सिंह, पार्थ सिंह और दीपेश सिंह ने पैरवी की। उनके सहयोगियों अजय, रामेंद्र और नमन प्रताप सिंह की मौजूदगी में आरोपियों का पक्ष अदालत के सामने रखा गया। जमानत आदेश में अदालत ने इस बात पर गौर किया कि लैपटॉप, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जांच एजेंसी पहले ही अपने कब्जे में ले चुकी है।
ऐसे में आगे हिरासत में लेकर पूछताछ की आवश्यकता को पर्याप्त रूप से प्रदर्शित नहीं किया गया। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि जब अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य पहले ही सुरक्षित किए जा चुके हैं, तो लगातार हिरासत में रखने का कोई सार्थक उद्देश्य स्पष्ट नहीं होता। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को भी महत्वपूर्ण माना।
पुलिस के बड़े दावों से अब जवाबदेही तक पहुंची कहानी
मामले की शुरुआत में 119 लोगों की गिरफ्तारी को बड़े साइबर अपराध नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई के तौर पर पेश किया गया था। पुलिस अधिकारियों ने मीडिया के सामने कार्रवाई की जानकारी दी और इसे बड़ी उपलब्धि के रूप में बताया। लेकिन अब घटनाक्रम का दूसरा पहलू सामने है- तीन पुलिसकर्मी निलंबित, छह लाइन हाजिर और चार आरोपियों को हाईकोर्ट से जमानत। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल निचले स्तर के पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई से उस पूरी कार्रवाई की जिम्मेदारी तय हो जाएगी, जिसे वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर से सार्वजनिक रूप से बड़ी सफलता बताया गया था?
अब जांच से ज्यादा पुलिस की जवाबदेही पर निगाह
समिट बिल्डिंग साइबर केस में अब सवाल केवल 119 लोगों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह भी है कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में क्या सभी कानूनी और प्रक्रियात्मक मानकों का पालन हुआ था? यदि जांच में खामियां सामने आई हैं तो उनकी जिम्मेदारी किस स्तर तक तय होगी?
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