लखनऊ के सरकारी अस्पतालों में 6 साल से बेबी स्क्रिनिंग ठप, हर महीने 5 हजार तक बच्चे बिना जांच लौट रहे घर
72 घंटे के भीतर होने वाली जांच के लिए 2019 के बाद नहीं मिला बजट, निजी केंद्रों में 2,500 से 4,500 रुपये तक खर्च; गरीब परिवारों पर बढ़ा बोझ
दरख्शां कदीर सिद्दीकी, अमृत विचार: सरकारी अस्पतालों, सीएचसी और पीएचसी को मिलाकर हर महीने लगभग 4,000 से 5,000 नवजात शिशु बिना स्क्रिनिंग ही घर जा रहे हैं। इन मासूमों के पैदा होते ही 72 घंटे की अंदर की जाने वाली गंभीर और जन्मजात बीमारियों की पहचान करने वाली न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग करीब छह सालों से बजट के अभाव में ठप पड़ी है।
केजीएमयू, लोहिया संस्थान, डफरिन, झलकारी बाई और लखनऊ की सीएचसी चिनहट, एनके रोड, तुड़ियागंज समेत नगरीय सीएचसी में नवजात शिशुओं की स्क्रिनिंग 2015 में शुरु की गई थी। इसके लिए एनएचएम से एसजीपीआई को बजट मिलता था। संबंधित अस्पताल का फार्मासिस्ट विशेष फिल्टर पेपर पर नवजात शिशु की एड़ी से दो बूंदें खून लेकर एसजीपीआई जाता था। इसके तहत करीब 65,000 बच्चों की ही फ्री स्क्रीनिंग की गई थी लेकिन 2019 के बाद से बजट न जारी होने की वजह से इन बच्चों की स्क्रिनिंग ठप हो गई। जिसकी डफरिन, झलकारी बाई, लोहिया संस्थान और शहर की लगभग 8 से 10 अर्बन सीएचसी जैसे चिनहट, एनके रोड, तुड़ियागंज में पैदा होने वाले बच्चे बिना स्क्रिनिंग के ही घर जा रहे हैं।
गोल्डन ऑवर में न्यूबॉर्न बेबी के लिए यह पांच जांचे अहम
कंजेनिटल हाइपोथायरायडिज्म: थायराइड हार्मोन न बनने से बच्चा मानसिक रूप से मंदबुद्धि और शारीरिक रूप से विकलांग हो सकता है।
जी6पीडी डेफिशियेंसी: खून की लाल कोशिकाएं टूटने से नवजात को गंभीर पीलिया और खतरनाक एनीमिया होता है।
कंजेनिटल एड्रिनल हाइपरप्लासिया: यह एक गंभीर हार्मोनल बीमारी है, जिसमें सही समय पर इलाज न मिलने से शिशु की जान भी जा सकती है।
गैलेक्टोसीमिया: इसमें बच्चा दूध में मौजूद शक्कर को नहीं पचा पाता। समय पर पहचान न होने से लिवर खराब होने और मोतियाबिंद का खतरा रहता है।
बायोटिनिडेस डेफिशियेंसी: शरीर में विटामिन का इस्तेमाल न होने से मासूम को दौरे आने लगते हैं और दिमागी विकास रुक जाता है।
निजी पैथोलॉजी सेंटर्स में इसी जांच पैकेज की कीमत 2,500 से 4,500 रुपये तक है। गरीब परिवार इसका खर्च नहीं उठा पा रहे हैं। जिसकी वजह से हर महीने अस्पताल से डिस्चार्ज होने वाले हजारों नवजातों की स्क्रीनिंग ही नहीं हो पा रही है।
केजीएमयू में आईसीएमआर के तहत हो रही जांचे
केजीएमयू बाल रोग विभाग की डॉक्टर शालीनी त्रिपाठी ने बताया कि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद की तरफ से केजीएमयू में अभी जल्द ही बच्चों के लिए विशेष मुफ़्त स्क्रीनिंग सेवा शुरू की गई है, जिसके तहत चार मुख्य अनुवंशिक और गंभीर बीमारियों की मुफ़्त जांच की जा रही है। इस मुफ़्त स्क्रीनिंग में कंजेनिटल हाइपोथायरायडिज्म जिसमें थायराइड हार्मोन न बनने से बच्चा मानसिक रूप से मंदबुद्धि हो सकता है, जी6पीडीडेफिशियेंसी जिसमें खून की कोशिकाएं टूटने से नवजात को गंभीर पीलिया होता है, कंजेनिटल एड्रिनल हाइपरप्लासिया जानलेवा हार्मोनल असंतुलन की बीमारी और गैलेक्टोसीमिया दूध में मौजूद शक्कर न पचा पाने से लिवर खराब होने का खतरा शामिल हैं।
डफरिन अस्पताल में नहीं हो रही बच्चों की स्क्रिनिंग
वहीं डफरिन अस्पताल में बच्चों की स्क्रिनिंग नहीं की जा रही है। डफरिन के बाल रोग विभाग के डॉक्टर सलमान ने बताया कि यदि किसी बच्चे को देखकर हमें कंजेनिटल हाइपोथायरायडिज्म का अनुमान होता है तो हम उसकी थायराइड की जांच शक के आधार पर करा लेते है लेकिन सभी बच्चों की स्क्रिनिंग नहीं होती है।
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