उधारी में मना त्योहार, अब मजदूरी का इंतजार: 'जी-राम-जी' योजना के 3.25 करोड़ बकाया, ट्रेजरी के चक्कर में फंसे मजदूर
जी-राम-जी योजना के दावों की खुली पोल, बरेली में 3.25 करोड़ की मजदूरी के लिए भटक रहे श्रमिक
बरेली में 'विकसित भारत जी-राम-जी योजना' के तहत मजदूरों का 3.25 करोड़ रुपये का भुगतान अटक गया है, जिससे उन्हें उधारी में त्योहार मनाना पड़ा।
बरेली, अमृत विचार। 'विकसित भारत जी-राम-जी' योजना के तहत जिले में सिस्टम की लेटलतीफी ने गरीब मजदूरों के त्योहार की मिठास फीकी कर दी है। जिन अफसरों ने योजना लागू होते वक्त सप्ताह भर में मजदूरी खाते में भेजने का बड़ा दावा किया था, वे अब दो महीने बाद भी हजारों श्रमिकों की खाली मुट्ठी नहीं भर पाए हैं। स्थिति यह है कि जिले में श्रमिकों का 3.25 करोड़ रुपये का भुगतान अटका हुआ है। रक्षाबंधन जैसे बड़े त्योहार पर भी मजदूरी न मिलने से मजदूरों को मजबूरन कर्ज लेकर परिवार का पेट पालना पड़ा और त्योहार की रस्में पूरी करनी पड़ीं।
नई व्यवस्था में उलझा भुगतान, ब्लॉक के कट रहे चक्कर
एक जुलाई से प्रदेश में लागू हुई इस नई योजना की शुरुआत में जनप्रतिनिधियों और अफसरों ने इसके खूब कसीदे पढ़े थे। लेकिन हकीकत यह है कि नई व्यवस्था में एफटीओ (FTO) जनरेट होने से लेकर ट्रेजरी तक भुगतान की प्रक्रिया बुरी तरह उलझ गई है। मजदूर अपने ही पैसों के लिए ब्लॉक मुख्यालयों और अफसरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासनों की घुट्टी पिलाई जा रही है।
कोषागार (ट्रेजरी) की ढिलाई बनी मुख्य वजह
मजदूरी समय से न मिलने के पीछे मुख्य वजह नई व्यवस्था और कोषागार की सुस्त कार्यप्रणाली सामने आ रही है। नई व्यवस्था के तहत ब्लॉकों से एफटीओ जनरेट होने और डीडीओ के सत्यापन के बाद इसे कोषागार (Treasury) भेजा जाता है, जहां से मजदूरों के खातों में पैसा ट्रांसफर होता है। शासन स्तर से इस योजना के लिए 18 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि पहले ही स्वीकृत की जा चुकी है, लेकिन ट्रेजरी स्तर पर हो रही देरी मजदूरों पर भारी पड़ रही है। इस मामले में प्रभारी डीसी मनरेगा चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव का कहना है कि चार ब्लॉकों से एफटीओ समय से जनरेट न होने के कारण यह तकनीकी दिक्कत आई है। उन्होंने दावा किया है कि आगामी तीन से चार दिनों में पैसा मजदूरों के खातों में पहुंच जाएगा।
छला गया मजदूर: छलका श्रमिकों का दर्द
भुगतान न मिलने से मायूस श्रमिकों ने अपना दर्द बयां करते हुए सिस्टम की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं:
अखलेश सिंह: "हफ्ते भर में पैसे मिलने का दावा बिल्कुल झूठा निकला। दो महीने से चक्कर काट रहे हैं, अधिकारी सिर्फ कोरा आश्वासन देते हैं। उम्मीद थी रक्षाबंधन तक पैसा मिल जाएगा, लेकिन अपने ही खून-पसीने के पैसों के लिए तरसना पड़ रहा है।"
अभिषेक: "सोचा था नई योजना से तुरंत पैसा मिलेगा, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। रक्षाबंधन तो उधारी लेकर जैसे-तैसे बीत गया, लेकिन अब आने वाले त्योहारों और घर के खर्च की चिंता सता रही है। हमारा रुका हुआ भुगतान जल्द होना चाहिए।"
अतुल शर्मा: "दो महीने से मजदूरी का एक रुपया नहीं मिला है। उम्मीद थी कि रक्षाबंधन से पहले पैसे आ जाएंगे तो बहन को कुछ अच्छा उपहार दे सकूंगा। लेकिन, खाली हाथ रहने की वजह से किसी तरह त्योहार की रस्म पूरी करनी पड़ी।"
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