Teacher’s Day Special : मास्टर जी ने 25 लाख की जमीन खरीदी, जंगल के बीच खोल दिए स्कूल; 400 बच्चों को दिखाई शिक्षा की राह
कॉर्बेट के जंगल में मास्टर जी की अनोखी पाठशाला:
कार्बेट नेशनल पार्क क्षेत्र में तैनात शिक्षक नवेंदु मठपाल ने पढ़ाई से वंचित बच्चों के लिए जनसहयोग से तीन सायंकालीन स्कूल शुरू किए हैं। छह वर्षों में इन स्कूलों से 400 से अधिक बच्चे जुड़े हैं। बुक्सा समुदाय के बच्चों के लिए उन्होंने अपनी 25 लाख रुपये की जमा पूंजी से जमीन खरीदकर तीसरा स्कूल शुरू किया। अब बच्चों की जरूरतों के अनुरूप विशेष पाठ्यक्रम तैयार करने की तैयारी है।
विनोद पपनै रामनगर, अमृत विचार: कार्बेट नेशनल पार्क के मध्य स्थित राजकीय इंटर कालेज ढेला में अंग्रेजी प्रवक्ता के रूप में तैनात नवेंदु मठपाल पिछले 6 वर्षों से वह कर रहे हैं जो सिस्टम नहीं कर पाया। पढ़ाई की मुख्यधारा से वंचित बच्चों के लिए उन्होंने शिक्षा की एक समानांतर रोशनी जला रखी है।
रचनात्मक शिक्षक मंडल के बैनर तले सरकारी शिक्षकों की एक छोटी सी टीम के साथ वे रामनगर के ग्रामीण और वन-ग्राम क्षेत्रों में 3 सायंकालीन स्कूलों का संचालन कर रहे हैं। पूर्णतः जनसहयोग से चल रहे इन स्कूलों से आज 400 से अधिक बच्चे जुड़े हुए हैं।
इस अभियान की शुरुआत बेहद मानवीय त्रासदी से हुई। अक्टूबर 2020 में कोसी नदी में आई भयंकर बाढ़ के बाद आपदाग्रस्त मजदूर परिवार के बच्चे बेसहारा हो गए थे। उन बच्चों को शैक्षणिक सहारा देने के लिए 26 नवंबर 2020 को संविधान दिवस के दिन पुछड़ी में जोतिबा फुले सायंकालीन स्कूल खोलकर इस मुहिम की नींव रखी गई।
इसके बाद जनवरी 2021 में इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए घने जंगलों के बीच कार्बेट पार्क से सटे पटरानी गांव में सावित्रीबाई फुले सायंकालीन स्कूल खोला गया। बाद में यहीं पर बालिकाओं के लिए सावित्रीबाई फुले बालिका कंप्यूटर केंद्र भी शुरू किया गया। परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2021 के नए शैक्षणिक सत्र में इन क्षेत्रों के 200 से अधिक बच्चों ने शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ते हुए नजदीकी सरकारी स्कूलों में प्रवेश लिया।
पर अभियान यहीं नहीं रुका। 2025 के अंतिम महीनों में इसे और गति देते हुए नवेंदु मठपाल ने जनजातीय बच्चों की शिक्षा के लिए एक बड़ा त्याग किया। उन्होंने अपनी जमा पूंजी से 25 लाख रुपए निकालकर सांवल्दे पश्चिम में जमीन खरीदी और बुक्सा समुदाय के बच्चों के लिए तीसरे सायंकालीन स्कूल की शुरुआत की।
इस विद्यालय की नींव तत्कालीन उत्तराखंड बोर्ड सचिव और वर्तमान शिक्षा निदेशक माध्यमिक वी.पी. सिमल्टी ने रखी। 30 जनवरी 2026 को अपर शिक्षा निदेशक एस.पी. सेमवाल द्वारा इसकी विधिवत शुरुआत की घोषणा की गई। वर्तमान में इस विद्यालय से भी 100 से अधिक बच्चे जुड़ चुके हैं, जबकि पुछड़ी और पटरानी के स्कूल यथावत जारी हैं।

इन स्कूलों की खासियत यह है कि यहां बच्चों को निशुल्क पढ़ाया जाता है। जनसहयोग से शैक्षणिक सामग्री के साथ-साथ जाड़ों में गर्म कपड़े भी वितरित किए जाते हैं। पढ़ाई के अलावा समय-समय पर बाहर से आए एक्सपर्ट्स द्वारा बच्चों को थियेटर, सिनेमा और पर्यावरणीय गतिविधियों की जानकारी भी दी जाती है। इन स्कूलों में मुख्य रूप से स्थानीय युवा ही बतौर शिक्षक पढ़ाते हैं, जबकि शिक्षक मंडल से जुड़े शिक्षक सहयोगी की भूमिका में रहते हैं।
नहीं लेंगे कोई पुरस्कार
पूर्णतः जनसहयोग से सायंकालीन स्कूलों को संचालित कर रहे नवेंदु मठपाल का कहना है कि वे यह कार्य किसी पुरस्कार के लिए नहीं कर रहे हैं। वे व्यक्तिगत रूप से कभी भी कोई भी पुरस्कार नहीं लेंगे।
दादा से मिली प्रेरणा:
नवेंदु मठपाल के दादा हरिदत्त मठपाल एवं नाना अंबादत्त बेलवाल दोनों ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। दादा हरिदत्त मठपाल तो अल्मोड़ा जनपद में मानिला इंटर कॉलेज एवं प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत के संस्थापक भी रहे। पिता मथुरादत्त मठपाल को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला जबकि ताऊ जी यशोधर मठपाल को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। नवेंदु के अनुसार दादा की शिक्षा के प्रति अलख जगाने की प्रवृत्ति ने ही उन्हें सायंकालीन स्कूल अभियान के लिए प्रेरित किया।
सायंकालीन स्कूलों का बन रहा है विशेष पाठ्यक्रम:
रचनात्मक शिक्षक मंडल की टीम स्कूलों के संचालन के साथ-साथ इन स्कूलों से जुड़े बच्चों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विशेष पाठ्यक्रम निर्माण का प्रयास भी कर रही है। 20 वर्षों तक एससीईआरटी देहरादून से जुड़े मदन मोहन पांडे एवं हेमलता तिवारी तथा प्रकृतिविद राजेश भट्ट के नेतृत्व में एक टीम इस कार्य को अंजाम दे रही है।
