ईश्वर से श्रेष्ठ थे हमारे गुरु
हमने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव के प्राथमिक विद्यालय से पूरी की है। उस समय जब हम अपने गांव के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ा करते थे, तब हमारे गांव के आस-पास दूर-दूर तक कही किसी भी कांवेंट स्कूल का कोई भी नामो निशान तक नहीं था। आज तो हालत यह है कि प्रतिवर्ष कान्वेंट स्कूल ऐसे खुल रहें है जैसे कि इस तरह के स्कूल खोलने की कोई बहुत बड़ी प्रतिस्पर्धा चल रही हो, लेकिन कांवेंट की शिक्षा पद्धति ने हमारे देश के शिक्षक छात्र के मधुर और वात्सल्यपूर्ण संबंधों की एक पूरी समृद्ध परंपरा और उसकी संस्कृति का क्षरण किया है। हमारे समय में शिक्षक को भगवान से भी ऊंचा दर्जा हासिल था। लोग कबीर के इस दोहे से अपनी भावी पीढ़ी को शिक्षक के प्रति सम्मान करने के लिए प्रेरित करते थे कि “गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागे पाय,बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।” लेकिन आज की व्यापारिक शिक्षा इस आचरण के बिल्कुल विपरित है।
उस समय एक शिक्षक अपने छात्र को अपने से भी ज्यादा श्रेष्ठ बनाने के लिए अपना दिन रात एक कर देते थे, तब अंतर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी तो सिखाई और पढ़ाई जाती थी, लेकिन उस भाषा में ‘गुड मॉर्निंग और गुड इवनिग’ जैसी अनिवार्यता नहीं थी। हम सभी अपने शिक्षक का सम्मानपूर्वक चरण स्पर्श करते थे।
शिक्षक के उस वात्सल्य को आज की ये शिक्षा छू भी नहीं पा रही। अब तो बस कांवेंट स्कूल के नाम पे हमारे छोटे-छोटे बच्चों की मासूम कंधों और उनकी पीठ पर भारी-भरकम बोझ सा लाद दिया जा रहा है और उस बोझ तले दबा बचपन अपनी मूल बाल्यावस्था की अंतस चेतना और उल्लास को पूरी तरह से जी नहीं पा रहा, जबकि उन दिनों हमारी पीठ और हथेली हफ्ते में कम से कम एक दिन अवश्य अपने पीटे जाने की गवाही दिया करते थे।
हफ्ते का वो दिन जब नजदीक आता, तो उस दिन कोई न कोई बहाना अपनी समस्त बुद्धि झोंककर अगर विद्यालय न जाने का हम बना भी ले ते थे, तो उसकी भरपाई हमे दूसरे दिन करनी पड़ती थी। इतना ही नहीं हफ्ते के उस दिन जो भी छात्र शिक्षक के द्वारा पुछे गए सारे प्रश्नों का उत्तर ठीक-ठीक दे लेता था, तो उस पूरे हफ्ते वह छात्र गांव के उन सभी पढ़ने वाले छात्रों के सामने से ऐसे चलता था कि मानो ‘उसने कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया हो।’
उस समय शिक्षको के अपने कुछ प्रिय शब्द हुआ करते थे, जिसका प्रयोग वे तब गाहे-बगाहे किया करते थे। जब वे किसी पाठ विशेष को पढ़ाते-पढ़ाते और समझाते-समझाते ऊब जाते और छात्र उनके पढ़ाए या समझाए को न समझ पा रहा हो, तब वे बहुत ही प्यार से एक-एक को अपने पास बुलाकर हमारे समय के सबसे चर्चित एंटीना अर्थात हमारी कान को थोड़ा सा उमेठते और कहते तुम एकदम से “बेवकूफ उल्लू और गधे हो" इतनी बार समझाने पर भी तुम्हें हमारी बात समझ में नहीं आ रही।”
शिक्षक के उस ऐंठे हुए कान ने जब आगे चलकर उनकी उस दी हुई शिक्षा का अनुश्रवण करना शुरु किया, तो तब लगा कि अगर आज के समय में किसी कांवेंट स्कूल के टीचर ने इस तरह से अपने छात्र के कान को उमेठा होता, तो आज की आधुनिक शिक्षा की तकनीकी के तहत हमारे वे सारे शिक्षक अपराधी कहे जाते, क्योंकि आज की शिक्षा “अंतर्राष्ट्रीय मनोविज्ञान की शिक्षा है, जबकि हमारे समय की शिक्षा गुरु और शिष्य के परंपरा की शिक्षा थी।” मैं इस दुनिया की भीड़ में खुद को आदमी बनाए रख सका तो अपने गांव के उन्ही शिक्षकों की बदौलत।
