रुद्रपुर: कर्मवीर नरेंद्र बोले- “अखबार बांटता रहूंगा-जब तक है जान” 

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रुद्रपुर, अमृत विचार। “हिम्मत-ए मर्दा तो मदद-ए खुदा”, यह कहावत नगर के ऊर्जावान अखबार वितरक नरेंद्र कोली पर एकदम सटीक बैठती है। जिन्होंने अपनी लगन व समर्पण से आज अखबार वितरण की दुनिया में अलग मुकाम हासिल किया है। आज उनके 600 ग्राहक हैं जो उनकी समयबद्धता के कारण ही उन्हें आदर देते हैं। वह कहते हैं कि अखबार …

रुद्रपुर, अमृत विचार। “हिम्मत-ए मर्दा तो मदद-ए खुदा”, यह कहावत नगर के ऊर्जावान अखबार वितरक नरेंद्र कोली पर एकदम सटीक बैठती है। जिन्होंने अपनी लगन व समर्पण से आज अखबार वितरण की दुनिया में अलग मुकाम हासिल किया है। आज उनके 600 ग्राहक हैं जो उनकी समयबद्धता के कारण ही उन्हें आदर देते हैं। वह कहते हैं कि अखबार वितरण के कार्य ने उनको छोटी उम्र में ही आत्मनिर्भर बना दिया। इस कार्य से उन्हें आत्मिक संतुष्टि मिलती है। उन्हें लगता है कि किसी व्यक्ति को आंख खुलने के साथ ही देश-विदेश की ताजा खबरों से रूबरू कराना बहुत संतुष्टि देता है। अपनी सफलता के लिए समाचार-पत्रों का आभार जताते हुए नरेंद्र कहते हैं कि “अखबार बांटता रहूंगा-जब तक है जान”।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं के कतगांव के रहने वाले नौबतराम कोली ने साठ के दशक में रुद्रपुर को अपनी कर्मस्थली बनाया। साल 1977 में उनके पहले पुत्र के रूप में नरेंद्र का जन्म हुआ।

रम्पुरा के वार्ड नंबर 23 में रहने वाले नरेंद्र पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। घर के बड़े बेटे होने के कारण नरेंद्र को अपनी जिम्मेदारियों का बखूबी एहसास था। नरेंद्र बाल्यकाल से ही मेधावी और मेहनती थे। अपने परिवार की साधारण पृष्ठभूमि को देखते हुए उन्होंने 12 वर्ष की आयु से ही अखबार वितरण का कार्य शुरू कर दिया। अपने पिता का आर्थिक सहयोग करने के साथ ही उन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा स्थानीय जनता इंटर कॉलेज से प्राप्त की। इसके बाद शहीद भगत सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय से बीकॉम की डिग्री भी ली। पिता नौबतराम ने इस बीच चंपावत जिले में अपनी कपड़े की दूकान खोल ली। इस दौरान पिता के साथ मिलकर घर को आर्थिक उन्नति की ओर ले जाते नरेंद्र ने अपने चारों भाई-बहनों की शिक्षा में कोई कमी नहीं आने दी।

कालांतर में एक भाई ने डिप्लोमा प्राप्त कर गाड़ियों की रिपेयरिंग में महारत हासिल की तो दूसरे भाई ने पिता का हाथ बंटाने को चंपावत जाने का फैसला लिया। परिवार ने मिलकर शेष दोनों बहनों की अच्छे घरों में शादियां भी करवाईं। इससे पहले साल 1998 में नरेंद्र का विवाह भी सुपा गांव रामपुर (उत्तर प्रदेश) की रहने वाली सुशीला देवी से हुआ और उन्हें दो बेटों के रूप में संतान प्राप्ति हुई। नरेंद्र ने अपने बच्चों की शिक्षा में भी कोई कमी नहीं आने दी। अखबार वितरण का काम बदस्तूर जारी रहा और घर की स्थितियों में भी बदलाव आया। आज उनका बड़ा बेटा विनय बीएससी फाइनल ईयर का छात्र है तो छोटा बेटा अभिषेक पॉलिटेक्निक के अंतिम वर्ष में अध्ययनरत है।

 

बारिश से भीगे अखबारों को प्रेस कर बांटा

नरेंद्र कहते हैं कि अनेक बाधाएं और चुनौतिायां जीवन में आईं पर उन्होंने हार नहीं मानी। जब वह छोटे थे तो एक बार बारिश में साइकिल स्लिप हो गयी। सारे अखबार भीग गए मगर हिम्मती नरेंद्र ने दिमाग लड़ाया और सारे अखबारों को गरम प्रेस कर उनका वितरण किया। हंसते हुए बताते हैं कि अखबार वितरण करते समय दो बार दुर्घटना का शिकार भी हो चुके हैं, लेकिन ज्यादा गंभीर चोटें नहीं आईं। बचपन की यादें ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि तीन दशक पूर्व रुद्रपुर में नाम मात्र सड़कें हुआ करती थी। गांधी कॉलोनी, प्रीत विहार, लोक विहार, रम्पुरा, भूत बंगला जैसे इलाकों में बारिश के दिनों में घुटनों तक पानी भरा होता था, लेकिन उन्होंने इस कारण भी किसी भी दिन अखबार बांटने के काम को विराम नहीं दिया।

 

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