रुद्रपुर: राज्य में बादल फटने की घटना को राेकने के लिए वैज्ञानिकों ने बताया ये तरीका…

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अर्शी खान, रुद्रपुर। वैसे तो प्रकृति के कहर से बच पाना नामुमकिन है, लेकिन वैज्ञानिको ने ऐसी तकनीक भी ईजाद की है, जिससे प्रकृति के इस कहर को कम किया जा सकता है। इस क्रम में बादल फटने की घटना को आखिकार वैज्ञानिक तकनीक क्लाउड सीडिंग या मेघबीजन से रोका जा सकता है। पंतनगर विश्वविद्यालय …

अर्शी खान, रुद्रपुर। वैसे तो प्रकृति के कहर से बच पाना नामुमकिन है, लेकिन वैज्ञानिको ने ऐसी तकनीक भी ईजाद की है, जिससे प्रकृति के इस कहर को कम किया जा सकता है। इस क्रम में बादल फटने की घटना को आखिकार वैज्ञानिक तकनीक क्लाउड सीडिंग या मेघबीजन से रोका जा सकता है। पंतनगर विश्वविद्यालय के कृषि महाविद्यालय के मौसम विज्ञान विभाग के प्राध्यापक एवं निदेशक शोध डॉ. अजीत नैन ने बताया कि जब वातावरण में दबाव बेहद कम हो जाता है, तब अचानक भारी मात्रा में पानी बरसता है। इसे बादल फटना कहते हैं।

उत्तराखंड में एक बार फिर बादल फटने से भारी तबाही मच गई है। यहां के गढ़वाल क्षेत्र में बादल फटने से मार्ग अवरुद्व हो गए हैं। यही नहीं मौसम विभाग ने अगले 24 घंटे में भारी ओलावृष्टि की संभावना भी जताई है। भूस्खलन हो, भूकंप, सूनामी, बाढ़ या बादल का फटना, प्रकृति कई प्रकार से हम पर कहर बरपाती है। जिससे हजारों लाखों लोग हर साल काल के मुंह में समा जाते हैं।

बादल फटने की यह प्रक्रिया ज्यादा ऊंचाई पर नहीं होती, इसमें 100 मिलीमीटर या उससे अधिक  प्रतिघंटा की दर से बारिश होती है और बाढ़ जैसा मंजर दिखने लगता है। उन्होंने बताया कि बादल फटने को रोकने के लिए क्लाउड सीडिंग या मेघबीजन का इस्तेमाल किया जाए तो कुछ हद तक राहत मिल सकती है। इसमे ध्यान देने वाली बात कि क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल अलग-अलग जगह पर करें। जिससे वर्षा के कई केंद्र बन जाते हैं और बारिश अलग-अलग जगह होती है।

उन्होने बताया कि क्लाउड सीडिंग या मेघ बीजन से बादलों में मौजूद जल वाष्प शीघ्रता से वर्षा की बड़ी-बड़ी बूंदों में परिवर्तित हो जाते हैं और वर्षा शुरू हो जाती है। इसके लिए बादलों में बीजकारक पदार्थों को बिखेरा और छिड़का जाता है। उन्होंने बताया कि बीजकारक पदार्थ के रूप में प्रायः सूखी बर्फ (ठोस कार्बन डाइऑक्साइड) सिल्वर आयोडाइड और अमोनियम नाइट्रेट और यूरिया से युक्त द्रव्य प्रदार्थ प्रयोग में लाए जाते हैं। इनसे पैदा क्रिस्टल पानी से भरे बादलों से एक जगह वर्षा न करके टुकड़ों के रूप में जगह-जगह वर्षा करते हैं और भारी बारिश नहीं होती, जिससे नुकसान की आशंका कम बनी रहती है।

10-12 घंटे पहले मौसम का पता होने पर रोका जा सकता है बादलों का फटना

डॉ. अजीत नैन ने बताया कि क्लाउड सीडिंग या मेघबीजन के लिए मौसम की सही जानकारी का होना आवश्यक है। यानि इसके लिए मौसम विभाग को सतर्क रहना होगा। इसके कारगार साबित होने के लिए मौसम की सही भविष्यवाणी भी आवश्यक है। उन्होंने बताया कि 10-12 घंटे पहले मौसम की सही जानकारी होने पर बादलों को फटने को रोका जा सकता है, जिससे इस कृत्रिम तकनीक की समय रहते तैयारी की जा सके।

धरती और आकाश से किया जा सकता है क्लाउड सीडिंग

डॉ. अजीत नैन ने बताया कि क्लाउड सीडिंग या मेघ बीजन को धरती की सतह से भी किया जा सकता है और आकाश में बादलों के बीच जाकर भी किया जा सकता है। साथ ही इस तकनीक का प्रयोग बादल फटने से रोकने के लिए ही नहीं बल्कि कृत्रिम बारिश कराने तथा धुंध हटाने के लिए भी किया जा सकता है। इसके लिए रॉकेट, हवाई जहाज या ड्रोन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कैसे करते हैं कृत्रिम वर्षा 

डॉ. अजीत नैन ने बताया कि मेघ बीजन से वाष्पीकरण शीघ्रता से वर्षा की बड़ी-बड़ी बूंदों में परिवर्तित हो जाते हैं और बरस पड़ते हैं। इसके लिए बादलों में बीजकारक पदार्थों को बिखेरा और छिड़का जाता है। बीजकारक पदार्थ के रूप में प्रायः सूखी बर्फ (ठोस कार्बन डाइऑक्साइड) सिल्वर अयोडाइड और अमोनियम नाइट्रेट और यूरिया से युक्त द्रव्य प्रयोग में लाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें कृत्रिम वर्षा के उद्देश्य से बादलों में कृत्रिम नाभिकों या केंद्रकों को उत्पन्न किया जाता है जिनके ऊपर लघु जल क्रिस्टल अथवा हिमकणों के एकत्रित होने से उनके आकार में वृद्धि होती है और जल की बूंदों अथवा हिम गोलियों का निर्माण होता है और वर्षा प्रारंभ हो जाती है।

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