जनता को चूसने का उपकरण बन गए पेट्रोल और डीजल

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संजय सिंह, नई दिल्ली। पेट्रोल और डीजल से अथाह कमाई करने के बावजूद केंद्र सरकार इनके दामों में असहनीय बढोतरी को प्रश्रय दे रही है। जनता को राहत देने के लिए वो इन उत्पादों पर उत्पाद शुल्क में माकूल कमी के लिए तैयार नहीं है। पेट्रोल के दाम 100 रुपये की मनोवैज्ञानिक सीमा को छूने …

संजय सिंह, नई दिल्ली। पेट्रोल और डीजल से अथाह कमाई करने के बावजूद केंद्र सरकार इनके दामों में असहनीय बढोतरी को प्रश्रय दे रही है। जनता को राहत देने के लिए वो इन उत्पादों पर उत्पाद शुल्क में माकूल कमी के लिए तैयार नहीं है। पेट्रोल के दाम 100 रुपये की मनोवैज्ञानिक सीमा को छूने लगे हैं। जबकि डीजल की कीमतें भी पीछे-पीछे चल रही हैं। कोरोना के चलते ट्रकों का मूवमेंट भी सीमित है। न्यून परिवहन का असर जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पर पड़ रहा है। खाद्य तेल, दालें, फल-सब्जी, दवाएं और मेडिकल उपकरण आदि सब महंगे हो गए हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार को जनता पर तरस नहीं आ रहा।

पिछले छह सालों में केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क में 2 गुना, जबकि डीजल में 6 गुना तक बढोतरी की है। दूसरी ओर इसी दौरान राज्य सरकारों ने इन दोनों पेट्रो उत्पादों पर वैट के जरिये दो गुना तक की कमाई की है। इससे जहां केंद्र के खजाने में 94 फीसद की बढोतरी हुई है और वह 1,72,000 करोड़ से बढ़कर 3,34,200 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। वहीं, राज्यों को वैट से होने वाली कमाई में 37 फीसद तक का इजाफा हुआ है और वो 1,60,500 करोड़ से बढ़कर 2,21,000 करोड़ रुपये हो गई है।

केंद्र का ये अमानवीय रुख इस तथ्य के बावजूद है कि 2014 से 2015 तक कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम काफी कम थे। इसके बावजूद सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कमी करने की जहमत नहीं उठाई। उल्टे इसमें बढोतरी का मार्ग चुना। 2015 से अब तक केंद्र ने लगातार ऐसी नीति अपनाए रखी है जिससे पेट्रोल और डीजल के दामों में ज्यादा अंतर न रहे।

केंद्र के साथ राज्यों का रवैया भी पेट्रोल के मुकाबले डीजल पर टैक्स का अधिक बोझ डालने का रहा है। 2014 में पेट्रोल पर एक्साइज और वैट का बोझ 31 फीसद जबकि डीजल पर 19 फीसद था। जिससे डीजल के दाम पेट्रोल के मुकाबले 14-15 रुपये तक कम थे। परंतु अब पेट्रोल पर एक्साइज और वैट का हिस्सा 69 फीसद और डीजल पर 58 फीसद होने से दोनों के दामों में 6-8 रुपये का अंतर रह गया है।

प्रति लीटर बढोतरी के लिहाज से देखें तो वर्ष 2014 में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क जहां मात्र 10.38 रुपये प्रति लीटर था। वहीं 2021 में तीन गुना बढ़कर 32.98 रुपये हो गया है। जबकि इसी दौरान डीजल पर उत्पाद शुल्क छह गुना बढ़कर 4.58 रुपये प्रति लीटर से 31.83 रुपये हो गया है।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार के बजट में चालू वित्तीय वर्ष 2021-22 के दौरान पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी से 3.2 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोरोना की दूसरी लहर न आती तो सरकार को इससे ज्यादा राशि प्राप्त होती। परंतु अब भी सरकार को पेट्रोल-डीजल से 3.2 लाख रुपये का राजस्व अवश्य प्राप्त होगा।

इसलिए यदि सरकार चाहे तो अब भी जनता को राहत दे सकती है। राजस्थान, पश्चिम बंगाल, असम और मेघालय जैसे राज्यों ने वैट में कमी कर केंद्र के सामने पहले ही उदाहरण प्रस्तुत कर दिया है। वर्ष 2014 में जब मोदी सरकार आई थी तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 93 डॉलर प्रति बैरल थी। तबसे लेकर अब तक क्रूड के दाम ज्यादातर वर्षो में कम ही हुए हैं। वर्ष 2020 में 39.68 डॉलर के न्यूनतम स्तर पर आने के बाद अब क्रूड के दाम 60.06 डॉलर हैं।

इस बीच यदि सरकार चाहती तो इस कमी का लाभ ग्राहकों को दे सकती थी। मगर उसने ऐसा नहीं किया। उलटे एक्साइज बढ़ाकर दाम बढ़ाती रही। यही वजह है कि आज चारों तरफ त्राहिमाम का आलम है। हालत ये है कि कोरोना के कारण केंद्र व राज्य सरकारों की हालत खस्ता हो चुकी है। जहां खर्च बढ़े हैं, वहीं फैक्ट्री उत्पादन, वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति के साथ निर्यात पर भी बुरा असर पड़ा है। डीजल और पेट्रोल की मांग भी घट गई है। लिहाजा जीएसटी संग्रह भी अपेक्षा से कम होने की आशंका है।

इन हालात में राज्यों को जीएसटी के नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र को पैसों की तंगी का सामना करना पड़ रहा है। यहाँ तक कि उसे रिजर्व बैंक पर अधिक लाभांश देने का दबाव डालना पड़ा है। इन हालात में अर्थशास्त्रियों का कहना है कि केंद्र सरकार को इस साल तकरीबन 2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेने की जरूरत महसूस पड़ेगी जो उसके कर्ज के बोझ को और बढ़ा देगी।

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