स्वास्थ्य पर खर्च करने में भारत मालदीव से भी गया-गुजरा

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

संजय सिंह, नई दिल्ली। स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में भारत का स्थान विश्व के 196 देशों में 176वां है। भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ 1.8 फीसद स्वास्थ्य पर खर्च करता है। जबकि मालदीव जैसा नन्हा सा देश भी अपने नागरिकों को स्वस्थ रखने के लिए जीडीपी का 6.65 फीसद खर्च कर देता …

संजय सिंह, नई दिल्ली। स्वास्थ्य पर खर्च के मामले में भारत का स्थान विश्व के 196 देशों में 176वां है। भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ 1.8 फीसद स्वास्थ्य पर खर्च करता है। जबकि मालदीव जैसा नन्हा सा देश भी अपने नागरिकों को स्वस्थ रखने के लिए जीडीपी का 6.65 फीसद खर्च कर देता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के ग्लोबल हेल्थ एक्सपेंडीचर डेटाबेस के मुताबिक विकासशील देशों में मालदीव के अलावा लेटिन अमेरिकी देश अर्जेंटीना जीडीपी का 5.91 फीसद तथा कोलंबिया 5.47 फीसद स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करता है। जहां तक विकसित देशों का सवाल है तो स्वीडन इस मामले में सबसे आगे है। वो अपने नागरिकों को स्वस्थ रखने के लिए हर वर्ष जीडीपी की 9.27 फीसद राशि खर्च कर देता है। स्वीडन के बाद जापान का नंबर आता है जिसका खर्च 9.21 फीसद है। इस क्रम में जर्मनी जीडीपी का 8.88 फीसद, नॉर्वे 8.57 फीसद तथा अमेरिका 8.51 फीसद स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करता है।

2020 में कोरोना की पहली लहर के बाद अगली लहर के अंदेशे से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 2021-22 के लिए वित्त मंत्रालय से 1,21,890 करोड़ रुपये की मांग की थी। लेकिन बजट में उसे केवल 71,279 करोड़ रुपये (58.48 फीसद) मिले। यानी 50,621 करोड़ रुपये की कमी रह गई। यह तब है जबकि इससे पहले खुद सरकार ने 15वें वित्त आयोग के समक्ष 2021-22 से 2025-26 की अवधि के लिए स्वास्थ्य की मद में 5,97,907 करोड़ की जरूरत का आकलन पेश किया था।

कोरोना के बावजूद बजट में स्वास्थ्य मंत्रालय को मांग से बहुत कम आबंटन पर संसदीय समिति ने भी त्योरियां चढ़ाई हैं। उसने सरकार को स्वास्थ्य पर बजट आबंटन बढाते हुए दो साल में जीडीपी का 2.5 फीसद तथा पांच साल में 5 फीसद करने की ताकीद की है।
अमेरिका और ब्राजील के बाद कोरोना से सर्वाधिक तकरीबन 3.5 लाख मौतें भारत में हुई हैं। भारत में सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के अस्पताल ऑक्सीजन, वेंटिलेटर और दवाओं और ट्रेंड स्टाफ की कमी से जूझते देखे गए।

पिछले तीन दशकों के दौरान सरकारी स्वास्थ्य ढांचा ध्वस्त होने से भारत में प्राइवेट अस्पतालों की बाढ़ आ गई। लेकिन कोरोना महामारी की दो लहरों के बाद प्राइवेट अस्पतालों के प्रति जनता का नजरिया बदलने लगा है। और अब वे सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत किए जाने की आवाज उठाने लगे हैं। लोगों का मानना है कि 138 करोड़ जनसंख्या वाले भारत जैसे विकासशील देश में संक्रामक रोगों एवं महामारियों के इलाज के लिए अच्छे सरकारी अस्पतालों और डिस्पेंसरियों का विस्तृत ढांचा होना बेहद जरूरी है।

डब्लूएचओ और वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक इलाज में अत्यधिक खर्च के कारण हर साल 4.16 फीसद मध्यम वर्ग के लोग गरीबी की जद में आ जाते हैं। भारत में इलाज पर होने वाले कुल खर्च में सरकार का योगदान सिर्फ 27 फीसद है। यहां इलाज का 63 फीसद खर्च लोगों को अपनी जेब से देना पड़ता है। इसके मुकाबले चीन में इलाज पर व्यक्तिगत खर्च केवल 36 फीसद, ब्राजील में 27.5 फीसद, स्वीडन में 13.8 फीसद, जापान में 2.7 फीसद और अमेरिका में 10.8 फीसद है।

संबंधित समाचार