कोरोना ने मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर बढ़ाईं भारत की चुनौतियां
संजय सिंह, अमृत विचार, नई दिल्ली। कोरोना के कारण देश में पहले से गंभीर मानसिक रुग्णता की स्थिति के गंभीर होने का खतरा पैदा हो गया है। कोरोना ने लोगों को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की क्षति पंहुचाई है। एक अध्ययन के अनुसार कोरोना की पहली लहर के बाद 40.5 फीसद लोग मानसिक तनाव …
संजय सिंह, अमृत विचार, नई दिल्ली। कोरोना के कारण देश में पहले से गंभीर मानसिक रुग्णता की स्थिति के गंभीर होने का खतरा पैदा हो गया है। कोरोना ने लोगों को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की क्षति पंहुचाई है। एक अध्ययन के अनुसार कोरोना की पहली लहर के बाद 40.5 फीसद लोग मानसिक तनाव कर शिकार पाए गए। जबकि 38 फीसद कामकाजी महिलाओं में गंभीर मानसिक रोगों की उपस्थिति दर्ज की गई।
अध्ययनों से पता चलता है कि जिन घरों में कोरोना के कारण परिवार के किसी सदस्य की मौत हुई वहां बच गए परिजन उस आघात को झेल नहीं पा रहे हैं। जबकि जो लोग कोरोना से उबर गए हैं, उन्हें भी विभिन्न प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। लाकडाउन के कारण कमाई से वंचित अथवा बेरोजगार हुए स्वस्थ लोग भी मानसिक उद्विग्नता का शिकार हैं।
भारत में मानसिक रोगियों की संख्या पहले ही काफी चिंताजनक थी। कोरोना ने इसे और गंभीर बना दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने कुछ वर्ष पहले कहा था कि तकरीबन 7.5 फीसद भारतीय किसी न किसी मानसिक रोग के शिकार हैं। और यही रुख रहा तो 2020 तक भारत की तकरीबन 20 फीसद आबादी मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाएगी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों को उस वक्त ये अनुमान अतिशयोक्ति लगा था। परंतु कोरोना महामारी ने डब्लूएचओ की उक्त भविष्यवाणी को लगभग सही साबित कर दिया है।
लेकिन लगता है सरकार ने डब्लूएचओ के आकलन को कतई गंभीरता से नहीं लिया है। इसका प्रमाण राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्रोग्राम (नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम) को आबंटित बजट और वास्तविक खर्च है जिसमें बढ़ोतरी करने के बजाय सरकार उसे लगातार कम करने में जुटी है।
वर्ष 2018-19 के बजट में सरकार ने प्रोग्राम के लिए 50 करोड़ रुपये आबंटित किए थे। जिसे 2019-20 और 2020-21 में घटाकर 40 करोड़ रुपये कर दिया गया। इतना ही नहीं, इन वर्षों में प्रोग्राम पर वास्तविक खर्च महज क्रमशः 2.01 करोड़, 2.51 करोड़ और 9.07 करोड़ रुपये का ही हुआ।
इन आंकड़ों से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सरकार के रवैये का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि 2020 में कोरोना महामारी के बावजूद सरकार नहीं जागी और प्रोग्राम का बजट तथा खर्च बढ़ाने का कोई प्रयास उसकी तरफ से नहीं किया गया।
जबकि डब्लूएचओ के मेंटल हेल्थ एटलस, 2017 के मुताबिक भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या पर केवल 1.93 मानसिक चिकित्सा कर्मी और उससे भी कम मात्र 0.29 सायकायट्रिस्ट हैं। यह वैश्विक औसत से बहुत कम है। यही नहीं, यहां मानसिक चिकित्सा के क्षेत्र में कार्यरत क्लिनिकल स्वास्थ्य पेशेवरों का कोई डेटाबेस भी अभी तक नहीं बना है।
नवीनतम हैप्पीनेस इंडेक्स में भारत का स्थान विश्व के 149 देशों में 139वां है। यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की माने तो 18-24 आयु वर्ग के 65 फीसद भारतीय युवा मानसिक अवसाद के शिकार हैं।
