अल्मोड़ा: विकास के नाम पर संकट की ओर बढ़ रहे हिमालयी राज्य
अल्मोड़ा, अमृत विचार। उत्तराखंड में मानवाधिकार और पर्यावरण विकास के लिए अपनाई जा रही सरकार की नीतियां ठीक नहीं हैं। यही कारण है कि विकास के नाम पर हिमालयी राज्य लगातार संकट की ओर बढ़ रहे हैं। इससे बचने के लिए हिमालयी राज्यों के लोगों को मिलजुल कर प्रयास करने होंगे। नहीं तो भविष्य में …
अल्मोड़ा, अमृत विचार। उत्तराखंड में मानवाधिकार और पर्यावरण विकास के लिए अपनाई जा रही सरकार की नीतियां ठीक नहीं हैं। यही कारण है कि विकास के नाम पर हिमालयी राज्य लगातार संकट की ओर बढ़ रहे हैं। इससे बचने के लिए हिमालयी राज्यों के लोगों को मिलजुल कर प्रयास करने होंगे। नहीं तो भविष्य में इसके परिणाम घातक साबित होंगे। यह बात ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क व देशभर की करीब दो दर्जन संस्थाओं के संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कार्यक्रम के संयोजक पीसी तिवारी ने कही। उन्होंने कहा कि हमें हिमालयी राज्यों में जनाधिकारों की पैरवी के लिए सम्मिलित प्रयास करने होंगे। उन्होंने उत्तराखंड राज्य निर्माण, मुजफ्फर नगर व रामपुर तिराहा कांड का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य निर्माण के बीस साल बाद भी प्रदेश के हालात नहीं बदल सके हैं।
दिल्ली से चलने वाली राष्ट्रीय पार्टियों की सरकारों ने उत्तराखंड को केवल दूषित करने का काम किया है। पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक, प्रसिद्ध भूगर्भशास्त्री डॉ. नवीन जुयाल तथा प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. भरत झुनझुनवाला ने कोरोना के कारण इस कार्यक्रम में वर्चुअल माध्यम से प्रतिभाग किया और उन्होंने इस विषय पर अनेक शोधपरक और तथ्यात्मक जानकारी कार्यक्रम में मौजूद लोगों को दी। डॉ. पाठक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि एक वैश्विक चिंता है, जिसके लिए इन समस्याओं को वैश्विक परिदृश्य से ही समझना होगा। अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। विकास के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार और विनाश की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि विकास की परिभाषा टिकाऊ होनी चाहिए। हिमालय की संवेदनशीलता को बताते हुए उन्होंने कहा कि हिमालय का व्यवहार किशोरवय की तरह है।
इसलिए हमें हिमालय पर कुछ करने से पहले संवेदनशील होना होगा। डॉ. नवीन जुयाल ने जलवायु परिवर्तन पर बोलते हुए कहा कि वर्तमान समय में ग्लेशियरों को और अधिक जमना चाहिए था, लेकिन वे लगातार तापमान बढ़ने के कारण पिघलकर कम हो रहे हैं। विकास की अवधारणाएं ही बदल गई हैं। जो मनुष्य संसाधनों को उपयोग कर रहा था, वह दोहन करने लगा है। उन्होंने कहा कि नदियां सिर्फ पानी ही नहीं लाती, बल्कि अपने साथ पर्याप्त गाद भी लेकर आती है। लेकिन हमने इन्हीं नदियों में विकास का मलबा भी ढो दिया है। उन्होंने कहा कि रीते दिनों रैणी तथा तपोवन क्षेत्र में आपदा में मारे गए लोगों के लिए तपोवन परियोजना की निर्माणदायी संस्था एनटीपीसी को हत्या का जिम्मेवार माना जाना चाहिए।
जोशीमठ निवासी आन्दोलनकारी अतुल सती ने कहा कि दो तीन हजार फीट तक की ऊंचाई पर ऐसी कोई परियोजना नहीं बननी चाहिए, जो पहाड़ों के लिए हानिकारक है। एनटीपीसी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस हादसे के बाद रैणी गांव को विस्थापन की जरूरत हो गई है। अर्थशास्त्री डॉ. भरत झुनझुनवाला ने कहा कि बड़ी जल-विद्युत परियोजनाओं से उत्तराखण्ड के पर्यावरण को पांच तरह के नुकसान हो रहे हैं। इसमें भूमि का कटान, विस्फोटकों से घरों और पहाड़ों को खतरा, पानी राकने से मछलियों और जलीय-जीवों के प्रवास में रोक तथा संकट, वायु प्रदूषण तथा नदी के सौंदर्य समाप्त होना शामिल हैं। संवाद कार्यक्रम में गढ़वाल विवि के डॉ. मोहन पंवार, पालिकाध्यक्ष प्रकाश जोशी, रैणी निवासी संग्राम सिंह, अधिवक्ता अनुप्रथा, सुरभि साह, मंगल, सरिता मेहरा आदि अनेक लोग मौजूद रहे।
